परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी
परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी
संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)
ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने
दिल के दरवाज़े तलक बू-ए-वफ़ा आने दे
गर्मियों की रुत में सावन की घटाएँ ढूँढते हैं
कभी तो राहे-मुहब्बत में ये कमाल दिखे
किसे मालूम है किस नाम पर आवै
हमसे मिल कर भी मुलाक़ात नहीं करते तुम
उदासियों के नगर में उमंग भर जाओ
ये रोज़-रोज़ का ही रूठना-मनाना क्या
सुख चमेली की लड़ी हो जैसे
लिख दिया होता अगर हमने तमाशा होता
रहे जो आईनों से दूर तो क़दम बहक गये
जो वफ़ादार हों उन को ही वफ़ादार मिलें
कोई जोगन बग़ैर साजन के
नित नया फिर भी तयशुदा जैसा
सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ
सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ।
ख़ुद को इनसान समझने की सज़ा
काटूँ हूँ ॥
ये जो हरकत है इसे कौन
तरक़्क़ी बोले ।
इस की ख़ुशियों के लिये उस का
गला काटूँ हूँ ॥
भूल बैठा हूँ मैं कुदरत के
तवाजुन के उसूल ।
पेड़ की डाल की मानिन्द शिला
काटूँ हूँ ॥
जब भी धरती की धरोहर पे
चलाऊँ कैंची ।
ऐसा लगता है कि शंकर की जटा
काटूँ हूँ ॥
बाँटता, बेचता रहता हूँ ज़मीं के टुकड़े ।
मेरी औक़ात नहीं फिर भी ख़ला
काटूँ हूँ ॥
रात दिन करता ही रहता हूँ
हवा को ज़ख़्मी ।
अपनी परवाज़ की आरी से हवा
काटूँ हूँ ॥
सदा = आवाज़, तवाजुन = सन्तुलन, परवाज़ = उड़ान
जो इतना ही गिला है तीरगी से
जो इतना ही गिला है तीरगी 1 से।
सहर 2 सज कर दिखा दे रौशनी
से॥
हरा कर तो दिया दिल को जला
कर।
मैं चाहूँ और क्या अब आशिक़ी से॥
यूँ रब्त कोई उस का मेरे घर से नहीं था
यूँ रब्त कोई उस का मेरे घर से नहीं था।
पर, पल भी हटा दर्द मेरे दर से नहीं था॥
आवारा कहा जायेगा दुनिया में
हरिक सम्त।
सँभला जो सफ़ीना किसी लंगर से नहीं था॥
भटक न जाये कहीं और यह दिले-रौशन
जाने किसकी लगी है नज़र
जाने किसकी लगी है नज़र।
निभाई यार से यारी, मेरा श'ऊर था वो
ग़म की ढलवान तक आये तो ख़ुशी तक पहुँचे
हम तो समुन्दर हैं बस्ती से किनारा कर के
क़दम-क़दम पर ख़ूब सँभलने वाले हम
ग़नीमत से गुज़ारा कर रहा हूँ
बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन
3 मनुष्य 4 कृपाओं 5 उज्ज्वल-तत्व 6 कन्धों
ख़ुद को बेहतर बना रहा हूँ मैं
अपने सीने से लगा लेंगे हमें
1 भाग्य, क़िस्मत 2 आसमान [बहुवचना] 3 बुराई 4 परोपकार










