कोई जोगन बग़ैर साजन के

 
कोई जोगन बग़ैर साजन के,
            शम्अ की तर्ह जल रही होगी।
यह तो लोबान जैसी ख़ुशबू है,
            कोई मीरा पिघल रही होगी॥

सन्त, साधू, फ़क़ीर या दरवेश,
            सबने हमको यही बताया है।
ज़ोर तूफ़ाँ वहीं दिखायेगा,
            जिस जगह जोत जल रही होगी॥

सिर्फ़ इक माँ की तर्ह सोचें तो,
            आब की तर्ह साफ़ दिखता है।
माँ यशोदा ही बस उदास न थी,
            देवकी भी विकल रही होगी॥

गोपियाँ तो दया की मूरत थीं,
            बद्दुआ कैसे देतीं गिरिधर को।
जानती थीं रुलाया है जिसने,
            रूह उस की भी गल रही होगी॥

कुंजगलियों में आज भी राधा,
            ये ही गा-गा के कहती है कान्हा।
क्या तुम उस वक़्त मिलने आओगे,
            साँस जब घर बदल रही होगी॥

लोबान – एक वृक्ष जिसकी गोंद जलने के बाद सुगन्ध फैलाती है; आब – पानी

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