ग़नीमत
से गुज़ारा कर रहा हूँ।
मगर
चर्चा है जलसा कर रहा हूँ ॥
हरिक
लमहा मुसलसल हौले-हौले।
मैं
अपना कण्ठ नीला कर रहा हूँ॥
ठहरना
तक नहीं सीखा अभी तक।
अज़ल
से वक़्त जाया कर रहा हूँ॥
तसल्ली
आज भी है फ़ासलों पर।
सराबों
का ही पीछा कर रहा हूँ॥
मेरा
साया मेरे बस में नहीं है।
मगर
दुनिया पे दावा कर रहा हूँ॥
अज़ल
- आदि , सराब - मृग तृष्णा

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