परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

मैं तुझ को बहलाऊँ, तू मुझ को बहला


मैं तुझ को बहलाऊँ, तू मुझ को बहला।
अगर समझता है अपना तो हक़ जतला॥

भटक रहा है तू, तो मैं भी तनहा हूँ।
बोल कहाँ मिलना है चल तू ही बतला॥

डाँट-डपट कुछ भी कर, लेकिन मेरे भाई।
अपने बीच में दुनियादारी को मत ला॥

दावा है तुझ को भी तर कर देंगे अश्क़।
एक बार तो ख़ुद से मेरा ज़िक्र चला॥

आज कई दिन बाद मिले हैं फिर से हम।
भाई प्लीज़ ज़रा मेरे सर को सहला॥

पछतावे के अश्क़ बहा कर आँखों से।
मैं तुझ को नहलाऊँ तू मुझ को नहला॥

जी करता है फिर से खेलें खेल 'नवीन'
आँख-मिचौनी वाला वो पहला-पहला॥

अपना घर सारी दुनिया से हट कर है


अपना घर सारी दुनिया से हट कर है|
हर वो दिल, जो तंग नहीं, अपना घर है||

माँ-बेटे इक सँग नज़्ज़ारे देख रहे|
हर घर की बैठक में इक 'जलसाघर' है||

जिसने हमको बारीकी से पहचाना|
अक़बर उस का नाम नहीं, वो बाबर है||

बिन रोये माँ भी कब दूध पिलाती है|
वो जज़्बा दिखला, जो तेरे अन्दर है||

उस से पूछो महफ़िल की रंगत को तुम|
महफ़िल में, जो बंदा - आया पी कर है||

'स्वाती' - 'सीप' नहीं मिलते सबको, वर्ना|
पानी का तो क़तरा-क़तरा गौहर है||

सदियों से जो त्रस्त रहा, दमनीय रहा|
दुनिया में अब वो ही सब से ऊपर है||

मेरी बातें सुन कर उसने ये पूछा|
क्या तू भी पगला-दीवाना-शायर है||

पहले घर, घर होते थे; दफ्तर, दफ्तर|
अब दफ्तर-दफ्तर घर, घर-घर दफ्तर है||

हमें एक दूसरे से गर गिला शिक़वा नहीं होता


हमें एक दूसरे से गर गिला शिक़वा नहीं होता।
तो अंग्रेजों ने हम को इस क़दर बाँटा नहीं होता॥

नयों को हौसला भी दो, न ढूँढो ख़ामियाँ केवल।
बड़े शाइर का भी हर इक बयाँ आला नहीं होता॥

हज़ारों साल पहले सीक्ट्व आ गई होती।
अगर शकुनी युधिष्ठिर से जुआ खेला नहीं होता॥

अदब से पेश आना चाहिए साहित्य में सबको।
कोई लेखक किसी भी क़ौम का चेहरा नहीं होता॥

ज़रा समझो कि 'कॉरपोरेट' भी कहने लगा है अब।
गृहस्थी से जुड़ा इन्सान लापरवा' नहीं होता॥

वो बात क्या कि जिस में हक़ीक़त बयाँ न हो


वो बात क्या कि जिस में हक़ीक़त बयाँ न हो |
वो शे'र क्या कि जिस पे समय का निशां न हो ||

कर देगा सूर्य भस्म हमें इक सेकंड में |
फैला हमारे सर पर अगर आसमाँ न हो ||

'विनिवेश' वक़्त की है ज़रूरत, कुबूल है |
पर यह गुलामियत का नया तर्जुमाँ न हो ||

मंदी में और पुख्ता  हुई है हमारी सोच |
उपलब्धि है ये, इस पे हमें क्यूँ गुमाँ  न हो ||

आवाज़ की जगह तो स्विचों ने संभाल ली |
कल आने वाली नस्ल कहीं बेज़ुबाँ न हो ||

मुश्किलें मत पूछ, आसानी न पूछ


मुश्किलें मत पूछ, आसानी न पूछ।
है बड़ा, तो बात बचकानी न पूछ ।।

याद कर अपने लड़कपन के भी दिन।
क्यूँ हुई बच्चों से नादानी न पूछ।।

भेड़िया क्या जाने इंसानी रिवाज़|
धूर्त से तहज़ीब के मानी न पूछ।।

जो मुक़द्दर ने दिया कर ले कुबूल।
कर्ण! कुंती की परेशानी न पूछ ।।

थे फ़िदा जिस पर गुलाबों के मुरीद।
कौन थी वो श़क्ल नूरानी न पूछ।।

बोलना आता तो क्यूँ होता हलाल।
बेज़ुबाँ से वज़्हेक़ुरबानी न पूछ।।

रोशनी से गर तुझे परहेज़ है|
फिर सरंजामे-निगहबानी न पूछ।।

मछलियों के हक़ में बगुलों की जमात।
किस कदर है मुझको हैरानी न पूछ।।

हाथ कंगन आरसी मौज़ूद है।
अब तो कोई बात बेमानी न पूछ।।

उजालों के बिना दीदार मुमकिन हो न पायेगा


उजालों के बिना दीदार मुमकिन हो न पायेगा।
अँधेरे हों तो आईना भी हमको क्या दिखायेगा ।१।

हरिक अच्छे-बुरे पहलू को मिल-जुल कर दिखा देंगे।
मगर तब, जब कोई कुछ आईनों के बीच आयेगा।२।

हुनरमंदो तुम अपनी पैरवी ख़ुद क्यों नहीं करते।
वगरना कौन है जो आईनों को हक़ दिलायेगा ।३।

मुसाफ़िर सैर में मशगूल, नाविक नोट गिनने में।
नदी जब सूख जायेगी, हमें तब होश आयेगा ।४।

अगर लहरों पे रहना है, तो आँखें भी खुली रक्खो।
ज़रा भी चूक होगी तो समन्दर लील जायेगा।५।

कोई तो जा के समझाये हमारे कर्णधारों को


कोई तो जा के समझाये हमारे कर्णधारों को।
चलो मिल कर भटकने से बचाएँ होनहारों को॥

भले अफ़सर नहीं बनते, भले हाकिम नहीं बनते।
चलो हम मान लेते हैं कि सब आलिम नहीं बनते।
मगर इतने ज़ियादा नौजवाँ मुजरिम नहीं बनते।
सही रुजगार मिल जाते अगर बेरोज़गारों को॥

निरक्षरता निरंकुशता के धब्बे कैसे छूटेंगे।
कुशलता-दक्षता वाले ख़ज़ाने कैसे लूटेंगे।
अगर बादल नहीं छाये तो झरने कैसे फूटेंगे।
हमारी देहरी तक कौन लायेगा बहारों को॥

अगर सच में सुमन-सौरभ लुटाने की तमन्ना है।
अगर सच में धरा पर स्वर्ग लाने की तमन्ना है।
अगर सच में ग़रीबी को मिटाने की तमन्ना है।
तो फिर कर्ज़ों की दलदल से निकालें कर्ज़दारों को॥

चलन के सूर्य को संक्रान्ति हम जैसों से मिलती है।
हरिक संक्रान्ति को विश्रान्ति हम जैसों से मिलती है।
वो तो लोगों को मन की शान्ति हम जैसों से मिलती है।
वगरना पूछता ही कौन है साहित्यकारों को॥

माज़ी के मज़े लूटे जाएँ

गीत जो दिल को लुभाते हैं वही गाये जाएँ।
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

उँगलियाँ घिस के गुबारों से निकालें आवाज़।
कंकरी मार के मिट्टी के घड़े फोड़े जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

काश कुछ लोग हमें दिल से लगा लें अपने।
भीड़ में गुमशुदा बच्चों की तरह रोये जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

बालटी भर के अहाते में गिरा दें पानी।
फिर बिना वज़्ह गिरें, गिर के उठें, फिसले जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

कोई कारन नहीं बस यों ही फलों के छिल के।
उस की यादों का सफ़र करते हुये छीले जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

दिल के मजमूए में रक्खे हैं जो ख़त के पुरज़े।
मुँद कर आँखें गुलाबों की तरह सूँघे जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

इन से बढ कर न मुहब्बत की दवा है कोई।
हिज़्र के लमहे दवाई की तरह फाँके जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

कोई मुश्किल नहीं इस दश्त पै जादू करना। 
पंख परियों की तरह फ़िक्र के फैलाये जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

बाज़ आते नहीं झड़ने से शराफ़त के दाँत। 
चलो ये दाँत 'नवीन' अब तो कहीं गाड़े जाएँ॥
और ये करते हुये माज़ी के मज़े लूटे जाएँ॥

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी।
जो ठसक थी उस की अदाओं में किसी और में वो ठसक न थी॥

न तो कम पड़ा था मेरा हुनर न तेरा जमाल भी कम पड़ा।
तेरा हुस्न जिस से सँवारता मेरे हाथ में वो धनक न थी॥

फ़क़त इस लिये ही ऐ दोसतो मैं समझ न पाया जूनून को।
मेरे दिल में चाह तो थी मगर मेरी वहशतों में कसक न थी॥

ये चमन ही अपना  वुजूद है इसे छोड़ने की भी सोच मत।
नहीं तो बताएँगे कल को क्या यहाँ गुल न थे कि महक न थी॥

मेरी और उस की उड़ान में कोई मेल है ही नहीं ‘नवीन’।
मुझे हर क़दम पै मलाल था और उसे कोई भी झिझक न थी॥

मुरव्वत को बचाना चाहता हूँ

मुरव्वत को बचाना चाहता हूँ।
लिहाज़ा टूट जाना चाहता हूँ॥

फ़लक़ से रूठ जाना चाहता हूँ।
ज़मीं से दिल लगाना चाहता हूँ॥

अना का सर झुकाना चाहता हूँ। 
दरी-चादर बिछाना चाहता हूँ॥

बहाना है फ़लक़ पर टिमटिमाना।
फ़ना हो कर दिखाना चाहता हूँ॥

किसी को लूट कर मैं क्या करूँगा।
मैं तो ख़ुद को लुटाना चाहता हूँ॥

नज़र ख़ुद से मिलाऊँ भी तो कैसे।
तुम्हारा ग़म छुपाना चाहता हूँ॥

जो हम भी दाँव पै अपनी अना लगा देते

जो हम भी दाँव पै अपनी अना लगा देते।
यक़ीन जानो कि एक सल्तनत गँवा देते॥

ख़ुदा का शुक्र है सूरज नहीं हैं हम, वरना।
न जाने कितने परिन्दों के पर जला देते॥

सभी के साथ रहे, ग़म मिला, ख़ुशी बाँटी।
अगर अकेले ही रहते तो सब को क्या देते॥

हमें मिटाने की तरक़ीब कौन मुश्किल थी।
 क़लम से लिख के रबर से हमें मिटा देते॥

कहा तो होता कि तुम धूप से परेशाँ हो।
हम अपने आप को दुपहर में ही डुबा देते॥

यहाँ उजालों ने आने से कर दिया था मना।
वगरना किसलिये शोलों को हम हवा देते॥

तुम्हारे वासते रसते बुहारने थे 'नवीन'
तुम आना चाहते हो इतना ही बता देते॥

उठानी थी हम को सलाहों की गठरी

उठानी थी हम को सलाहों की गठरी।
मगर ढो रहे हैं गुनाहों की गठरी॥

कबीर आप जैसे जुलाहों की गठरी।
कहाँ खो गई ख़ैर-ख़्वाहों१ की गठरी॥

मुक़द्दर में ज़ख़्मात लिक्खे थे अपने।
सो ढोनी पड़ी हम को फ़ाहों२ की गठरी॥

उदासी को सब पर भरोसा नहीं था।
कहाँ सब को सौंपी है आहों की गठरी॥

हमारे लिये तो मुहब्बत का मतलब।
मुरव्वत से भीनी निगाहों की गठरी॥

तुम्हारा हृदय तो नगीना है साहब।
हमारा हृदय है पनाहों की गठरी॥

ये हलकी है गुल-फूल से भी यक़ीनन।
उठा कर तो देखो निबाहों की गठरी॥

हमारे ही सपने हैं पलकों के पीछे।
अमाँ खोलिये तो गवाहों की गठरी॥

समय की अदालत में वो भी हैं मुन्सिफ़।
“चुराते हैं जो बादशाहों की गठरी”॥

‘नवीन’ एक और ज़ाविये३ के मुताबिक़।
लगे है ख़ला! ख़ानक़ाहों४ की गठरी॥


१ शुभ-चिन्तकों  २ घाव पर लगाया जाने वाला रूई का फ़ाहा  ३ दृष्टिकोण ४ गुफाओं



बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की

बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की।
तो मुलतवी नहीं करें अरज किरायेदार की॥

न तो किसी उरूज की न ही किसी निखार की।
ये दासतान है सनम उतार के उतार की॥

बहुत हुआ तो ये हुआ कि हक़ पे फ़ैसला हुआ।
कहाँ समझ सका कोई शिकायतें शिकार की॥

चमन की जान ख़ुश्बुएँ हवा से डर गयीं अगर।
तो कैसे महमहाएँगी ये बेटियाँ बहार की॥

मरज़ मिटाने की जगह मरज़ बढाने लग गयीं।
बुराइयों में मिल गयीं दवाइयाँ बुख़ार की॥

ज़मीन पर हरिक तरफ़ तरन्नुमों का राज है।
कमाल का ख़याल हैं सदाएँ आबशार की॥

धुआँ धुआँ धुआँ धुआँ उड़ाते जा रहे हैं सब।
न जाने क्या दिखायेगी अब और ये एनारकी { Anarchy}

उठा-पटक के दौर में न शर्म है न लाज है।
भलाइयों की तश्तरी हमीं ने छार-छार की॥

अज़ीब कर दिया समाँ बिगाड़ दी है कुल फ़जा।
पसरती जा रही है लू मरुस्थली बयार की॥

न ख़ाक हूँ न चाक हूँ छड़ी न जल न डोरियाँ।
‘नवीन’ सच तो ये है बस कला हूँ मैं कुम्हार की॥

बेकराँ बेकराँ से उठता है

बेकराँ बेकराँ से उठता है।
आदमी आसमाँ से उठता है॥

ना-तवाँ, नीम-जाँ से उठता है।
बारे-ग़म बेज़ुबाँ से उठता है॥

तन पै आहो-फ़ुगाँ मला कीजे।
इश्क़ आहो-फ़ुगाँ से उठता है॥

क़ामयाबों से कब उठा है इश्क़।
ये तो नाकामराँ से उठता है॥

देख अब जा रहा हूँ तुझ से दूर।
आशियाँ आसताँ से उठता है॥

दिल धधकता है वस्ल की लौ में।
और धुआँ जिस्मो-जाँ से उठता है॥

बेदमे-ग़म में अब कहाँ वो दम।
शोर ही कारवाँ से उठता है॥

अपने घर में ही रहता है इनसान।
पर पराये मकाँ से उठता है॥

काश हम उस बटन पे आ पाएँ।
गीत का सुर जहाँ से उठता है॥

सच को सच मानते नहीं हम-लोग।
कब यक़ीं जिस्मो-जाँ से उठता है॥

जिसने आलम को कर दिया अन्धा।
वो धुआँ ख़ुद जहाँ से उठता है॥

कोई बतलाए इन हवाओं को।
हर बगूला कहाँ से उठता है॥

जिस को दुनिया समझती है तूफ़ाँ।
वो किसी बादबाँ से उठता है॥

ख़ुश्बुओं को बिखेरने का ख़र्च।
तो, किसी बागवाँ से उठता है॥

कैसे उठते हैं जानता है वह।
वाँ फिसल कर वहाँ से उठता है॥

जो कि पसरी है हर्फ़-हर्फ़ ‘नवीन’।
“इश्क़ उस दासताँ से उठता है”॥