ये रोज़-रोज़ का ही रूठना-मनाना क्या


ये रोज़-रोज़ का ही रूठना-मनाना क्या।
मुहब्बतों में सनम जीतना हराना क्या।।

पराई आँखों से जलधार को बहाना क्या।
नहीं है प्यार तो फिर प्यार का बहाना क्या।।

कभी तो इश्क़ नदी में उतर कर भी देखो।
नदी किनारे ही पानी को छपछपाना क्या।।

न फूल जैसी छुअन और न ख़ार जैसी चुभन।
पुरानी यादों को अब ओढ़ना-बिछाना क्या।।

अब उसको बाँहों में भरने का दिल नहीं करता। 
जो अपना है ही नहीं उस पे हक़ जताना क्या।।

कभी वनों को जलाया कभी बुझाये चराग़।
हवाओ तुमने किसी के मरम को जाना क्या।। 

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