हम गुनहगार हैं हम को तो गुनहगार
मिलें॥
कल ये बाज़ार न होगा तो बचेगा भी क्या।
हम भी इक चीज़ हैं हम को भी ख़रीदार मिलें॥
मुद्दतें हो गईं बरसात झमाझम न हुई।
अब तो सहरा-ए-मुहब्बत को मददगार मिलें॥
देख अपनों से निगह फेरना अच्छा नहीं है।
अब तो उलफ़त के तरफ़दारों को दरबार मिलें॥
जिन की बानी में दवाओं का असर हो मौजूद।
ऐ ख़ुदा ऐसे मसीहाओं को बीमार मिलें॥
रोटियाँ बाँटने वालों से गुजारिश
है ‘नवीन’।
ऐसा कुछ कीजै कि मज़दूरों को रुजगार
मिलें॥
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