परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

मशहूर शायर दुष्यन्त कुमार को समर्पित एक ग़ज़ल

ख़ुसूसो-ख़ास नगीनों में कोहेनूर हैं आप 
दिलोदिमाग़ पै तारी अजब सुरूर हैं आप 

किसी के वासते हैं आप मीर जैसे तो
किसी के वासते तुलसी, कबीर, सूर हैं आप 

तमाम हाथों को परचम थमाये ग़ज़लों के 
विनम्रता को लजाता हुआ ग़ुरूर हैं आप 

ज़ुबानी याद हैं बहुतों को आपके अशआर 
तो क्या हुआ कि ज़रा क़ायदों से दूर हैं आप 

जिसे जो कहना हो कहता रहे, उबलता रहे 
हमें तो लगता नहीं है कि बे-शऊर हैं आप 

फ़िज़ा के रंग में शामिल है ख़ुशबू-ए-दुष्यंत 
ज़हेनसीब, हमारे फ़लक का नूर हैं आप 

ईदी ग़ज़ल


गर चाहते हो सर पे तना आसमाँ रहे।
रब की इबादतों का सलीक़ा जवाँ रहे॥

अब के उठें जो हाथ लबों पर हो ये दुआ।
मालिक तमाम ख़ल्क़ में अम्नो-अमाँ रहे॥

इस के सिवा कुछ और नहीं मेरी आरज़ू।
हर आदमी ख़ुशी से रहे जब - जहाँ रहे॥

जन्नत से नीचे झाँका तो अजदाद ने कहा।
हम-तुम बँधे थे जिन से वे रिश्ते कहाँ रहे॥

आओ कि उस ज़मीन को सजदा करें 'नवीन'
ईश्वर के सारे अंश उतर कर जहाँ रहे॥

चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी


सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी।
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥

ईंट-पत्थर का कलेवर ईंट-पत्थर हो गया।
देखते ही देखते साम्राज्य खंडर हो गया।
सब की लापरवाहियों से घर जो जर्जर हो गया।
सिर्फ़ उस घर की मरम्मत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥

हम बहुत कमज़ोर हैं हम पर तरस खाओ हुज़ूर।
नफ़रतों की आग पर कुछ प्यार बरसाओ हुज़ूर।
जो हुआ सो हो गया अब तो सुधर जाओ हुज़ूर।
रोज़ शैतानों से मिन्नत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥

कम बुरे बन्दे को चुन कर आबकारी सोंप कर।
जिम्मेदारों को वतन की जिम्मेदारी सोंप कर।
सेंधमार अहले-वतन को सेंधमारी सोंप कर।
बस इशारा भर सियासत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥

रहबरों को राह दिखलाएँ इसी उम्मीद में।
मरहमों पर काम करवाएँ इसी उम्मीद में।
काश! कल कुछ काम आ जाएँ इसी उम्मीद में।
अपने ज़ख़्मों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥

यह न गाओ कि हो चुका क्या है


यह न गाओ कि हो चुका क्या है।
यह बताओ कि हो रहा क्या है॥

ख़ुद भगीरथ भी सोचते होंगे।
क्या किया था मगर हुआ क्या है

आप कहते हैं तंग थीं गलियाँ।
शाहराहों से भी मिला क्या है॥

झोंपड़े ही बतायेंगे खुल कर।
आज कल मुल्क में हवा क्या है॥

बह्स-बाज़ों को कौन समझाये।
अब का तब से मुक़ाबला क्या है॥

हम फ़क़ीरों को तो न बतलाओ।
बन्दगी क्या है और ख़ुदा क्या है॥

गर क़दीमी बचा नहीं सकती।
तो इलाज और दूसरा क्या है॥

दिल तो बच्चा है सो मचल बैठा।
कौन समझाये फ़लसफ़ा क्या है॥

क्लास में पूछता है इक बच्चा।
सर! मआनी ‘फ़िजूल’ का क्या है॥

झुक के बोला क़लम, इरेज़र से।
यार तुझको मुग़ालता क्या है॥

समझ में आते हैं कुछ इन्क़लाब आहिस्ता-आहिस्ता


समझ में आते हैं कुछ इन्क़लाब आहिस्ता-आहिस्ता।
करें भी क्या कि खुलते हैं सराब आहिस्ता-आहिस्ता॥

वही बज़्में, वही रस्में, वही ताक़त, वही गुर्बत।
उभरते जा रहे हैं फिर नवाब आहिस्ता-आहिस्ता॥

हमारी कोशिशों को ये जहाँ समझा न समझेगा।
हमें होना था यारो क़ामयाब आहिस्ता-आहिस्ता॥

समय थमता नहीं है और बदन भी थक रहा है अब।
बिखरते जा रहे हैं सारे ख़्वाब आहिस्ता-आहिस्ता॥

किसी बेशर्म से मिन्नत नहीं सख़्ती से पेश आओ।
ज़ुबाँ टपकायेगी सारे जवाब आहिस्ता-आहिस्ता॥


सराब – मृगतृष्णा, बज़्म - महफ़िल, गुर्बत - ग़रीबी


सभी से खुल के मिलता हूँ मेरा शेवा ही ऐसा है


सभी से खुल के मिलता हूँ मेरा शेवा ही ऐसा है।
जो दिल में आये कहता हूँ मेरा लहजा ही ऐसा है॥

मुझे भी दीखता है आईने में टूटता परबत।
मगर कुछ कर नहीं सकता मेरा क़िस्सा ही ऐसा है॥

मुझे मालूम है वो ही बताने पर तुले हो क्यों।
पसन्द आता नहीं सबको मेरा चेहरा ही ऐसा है॥

कोई भी दौर हो ये सर झुका कर ही रहा लेकिन।
किशन को चोर कहता है मेरा क़स्बा ही ऐसा है॥

किसी का दिल दुखाना मुझ को भी अच्छा नहीं लगता।
मगर मैं क्या करूँ यारो मेरा धन्धा ही ऐसा है॥

सुखों का ताज़ ठुकरा कर ग़मों पे नाज़ फरमा कर।
दिलों पे राज करता है मेरा कुनबा ही ऐसा है॥

भला मैंने किसी को भी कभी चिट्ठी लिखी थी क्या।
जो आये तुहफ़े लाता है मेरा ओहदा ही ऐसा है॥

सतत सनेह-सुधा-सार यदि बसे मन में।


सतत सनेह-सुधा-सार यदि बसे मन में।
मिले अनन्य रसानन्द स्वाद जूठन में॥

समुद्र-भूमि, तटों को तटस्थ रखते हैं।
उदारवाद भरा है अपार, कन-कन में॥

विकट, विदग्ध, विदारक विलाप है दृष्टव्य।
समष्टि! रूप स्वयम का निहार दरपन में॥

विचित्र व्यक्ति हुये हैं इसी धरातल पर।
जिन्हें दिखे ‘क्षिति-कल्याण-तत्व’ गो-धन में॥

ऋतुस्स्वभाव अनिर्वाच्य हो गया प्रियवर।
शरीर स्वेद बहाये निघोर अगहन में॥




लुट गये ख़ज़ाने और गुन्हगार कोई नईं


लुट गये ख़ज़ाने और गुन्हगार कोई नईं।
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

एक मरतबा नहीं हज़ार बार हो गया।
सभ्यता का श्वेत-वस्त्र दाग़दार हो गया।
ज्ञान का वितान हाय तार-तार हो गया।
उस प देखिये सितम कि शर्मसार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

क्या अज़ीब खेल है ग़रीब के नसीब का।
काम आ रहा न कोई दूर या क़रीब का।
कुष्ठ रोगियों समान हाल है ग़रीब का।
सब के सब हक़ीम हैं तीमारदार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

सभ्यता के पक्ष में जिरह खड़ी करेगा कौन।
मुन्सिफ़ों के सामने जिदाबदी करेगा कौन।
वक़्त की अदालतों में पैरवी करेगा कौन।
पेशकार हैं तमाम पैरोकार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

नरगिसों को रंज़ है कि दीदावर खिला नहीं।
जो सभी का बन सके वो आदमी बना नहीं।
मुद्दतों से एक अश्क़ आँखों से गिरा नहीं।
ग़मजदा तो हैं तमाम ग़मगुसार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

धूप गा रही है फाग दिल उगल रहे हैं आग।
मृग-मरीचिका के मन्त्र रट रहे हैं लोगबाग।
परबतों की मृत्यु पर विलाप कर रहे तड़ाग।
दूर-दूर तक जनाब सायादार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

व्यर्थ के 'नवीन' तथ्य छान कर करेंगे क्या।
हो किसी का भी क़ुसूर जान कर करेंगे क्या।
गन्दगी में अपने ज़ह्न सान कर करेंगे क्या।
सब यहाँ ज़हीन लोग हैं, गँवार कोई नईं॥
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

लुट गये ख़ज़ाने और गुन्हगार कोई नईं।
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं॥

नवरस ग़ज़ल


ग़ौर से सुनिये तो हर पल गुनगुनाती है हयात1।
हर घड़ी एक रूप धर कर गीत गाती है हयात॥
1ज़िन्दगी
*
शृंगार रस:-
दिल के दरिया में कनखियों की कँकरिया डाल कर।
इश्क़ के सोये हुये अरमाँ जगाती है हयात॥
*
हास्य रस:-
इश्क़ हो जाये रफ़ू-चक्कर झपकते ही पलक।
जब छरहरे जिस्म को गुम्बद बनाती है हयात॥
*
करुण रस:-
उन को भी भर पेट खाना मिल सके बस इसलिये।
बाल-मज़दूरों से मज़दूरी कराती है हयात॥
*
रौद्र रस:-
काम मिल जाये तो अच्छे दाम मिल पाते नहीं।
अक्सर इस पेचीदगी पर तमतमाती है हयात॥
*
वीर रस:-
पहले तो शाइस्तगी2 से माँगती है अपना हक़।
जब नहीं मिलता है हक़ - शमशीर3 उठाती है हयात॥
2 विनम्रता 3 तलवार
*
भयानक रस:-
क्या भयानक रूप दिखलाती है कोठों पर हहा!!
बेटियों की चीख पर ठुमके लगाती है हयात॥
*
वीभत्स रस:-
आदमी को भूनती है वक़्त के तन्दूर में।
हाय कैसा खाना, खाती है खिलाती है हयात॥
*
अद्भुत रस:-
एक बकरी दर्जनों शेरों पे हावी है जनाब।
देख लो सरकार! क्या क्या गुल खुलाती है हयात॥
*
शांत रस:-
बस्तियों की हस्तियों की मस्तियाँ ढो कर 'नवीन'
आख़िर-आख़िर शान्त हो कर गीत गाती है हयात॥

यक क़ाफ़िया ग़ज़ल - सवेरा हो गया है


कुहासा छँट गया और उजाला हो गया है।
गगनचर चल गगन को सवेरा हो गया है॥

वो भी था एक ज़माना, कि कहता था ज़माना।
चलो यमुना किनारे - सवेरा हो गया है॥

वो रातों की पढ़ाई - और अम्मा की हिदायत।
ज़रा कुछ देर सो ले - सवेरा हो गया है॥

बगल वाली छतों से, कहाँ सुनना मिले अब।
कि अब जाने दे बैरी - सवेरा हो गया है॥

कहीं जाने की जल्दी, कहीं इस बात का ग़म।
शब उतरी भी नहीं और - सवेरा हो गया है॥

न कुकड़ूँ-कूँ हुई और - न ही झरती है शबनम।
तो फिर हम कैसे मानें सवेरा हो गया है॥

न जाने क्यूँ वो औघड़ बिफर उठ्ठा था हम पर।
कहा जैसे ही उस से - सवेरा हो गया है॥

मेरे रुतबे में थोड़ा इज़ाफ़ा हो गया है


मेरे रुतबे में थोड़ा इज़ाफ़ा हो गया है।
अजब तो था मगर अब अजूबा हो गया है॥

अब अहलेदौर इस को तरक़्क़ी ही कहेंगे।
जहाँ दगरा था वाँ अब खरंजा हो गया है॥

छबीले तेरी छब ने किया है ऐसा जादू।
क़बीले का क़बीला छबीला हो गया है॥

वो ठहरी सी निगाहें भला क्यूँ कर न ठुमकें।
कि उन का लाड़ला अब कमाता हो गया है॥

अजल से ही तमन्ना रही सरताज लेकिन।
तलब का तर्जुमा अब तमाशा हो गया है॥

तेरे ग़म की नदी में बस इक क़तरा बचा था।
वो आँसू भी बिल-आख़िर रवाना हो गया है॥

न कोई कह रहा कुछ न कोई सुन रहा कुछ।
चलो सामान उठाओ इशारा हो गया है॥

भर दुपहरी में कहा करता है साया मुझ से


सोच बदलूँ तो बदल जाता है सारा मंज़र।
हो न हो द्रोण को अनुराग बहुत था मुझ से।
बख़्शनी थी उन्हें दुनिया को नयी तर्ज़े-हुनर।
शायद इस वास्ते माँगा हो अँगूठा मुझ से॥


भर दुपहरी में कहा करता है साया मुझ से।
धूप से तंग हूँ कुछ देर लिपट जा मुझ से॥

आज की रात मुझे पेश करोगे किस को।
शाम ढलते ही ख़मोशी ने ये पूछा मुझ से॥

तेरे काम आ के इसे चैन मिलेगा शायद।
आ मेरी जान! मेरी जान को ले जा मुझ से॥

पहले मामूल की मानिन्द झगड़ते थे हम।
अबतो कुछ भी नहीं कहती मिरी बहना मुझ से॥

किस से मिलते हो कहाँ जाते हो क्या करते हो।
काश ये पूछते रहते मिरे पापा मुझ से॥

मैं न हाकिम, न हुकूमत, न हवाला, न हुजूम।
क्यों सवालात किया करती है दुनिया मुझ से॥

वहशतों ने जहाँ वहमों की वकालत की थी।
पूछते रहते हैं लम्हे वो ठिकाना मुझ से॥

देना होगा तुझे एक-एक ज़माने का हिसाब।
वहशते-इश्क़ तू आइन्द: उलझना मुझ से॥

चुलबुले शेर हसीनों की तरह होते हैं।
और हसीनाओं को रखना नहीं रिश्ता मुझ से॥