बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
अमीरे-शह्र भी सचमुच ग़रीब लगता है
पढ़ाई सी ए की हो या मुहब्बतों वाली
ये ऐसे कोर्स हैं जिनमें नसीब लगता है
संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)
बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
अमीरे-शह्र भी सचमुच ग़रीब लगता है
पढ़ाई सी ए की हो या मुहब्बतों वाली
ये ऐसे कोर्स हैं जिनमें नसीब लगता है
यों ही फ़ाक़ों पर भला कबतक गुज़ारा हो
हुज़ूर
कोई तो हम बेसहारों का सहारा हो हुज़ूर
हम जो टूटे तो सभी ने क्रॉस कर लीं
उँगलियाँ
ज्यूँ हमारा ग़म कोई टूटा सितारा हो हुज़ूर
ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने
को
हमारे नाम से मन्सूब कर डाला फ़साने को
मुहब्बत से हसद की आग बुझ सकती है पर
दुनिया
नई ईज़ाद करती है पुरानी को बुझाने को