आ गये आगोश में कुछ देर शर्माने के बाद

आ गये आगोश में कुछ देर शर्माने के बाद।
रहमतें बरसा रहे हैं कह्र बरपाने के बाद॥

हाय उन लमहात की नादानियों को क्या कहें।
कुछ नज़र आता नहीं जब कुछ नज़र आने के बाद॥

ज़ख़्म देते हो तो मरहम भी लगाया कीजिये।
बाँहों में भर लीजिये अश्क़ों से नहलाने के बाद॥

टूट कर बिखरे हैं हम सो और बिखरेंगे अभी।
झट से रुक सकते नहीं मोती बिखर जाने के बाद॥

इश्क़ ने आख़िर अँधेरों को सबक़ सिखला दिया।
रोज़ शम्एँ जल रही हैं शाम ढल जाने के बाद॥

क्या पता कल आप ख़ुद परवाना बन जायें ‘नवीन’।
और दिया बन जायँ हम जल-जल के मर जाने के बाद॥

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