ज़िन्दगी
तेरे लिये और बहाने कितने।
एक
तमाशे के लिये और तमाशे कितने॥
बाँह
फैलाये हुये कब से खड़ा है महबूब।
रूह
बदलेगी बदन और न जाने कितने॥
आग
पानी से बचाओ तो हवा की दहशत।
ज़िन्दगी
अक्स बनाये तो बनाये कितने॥
जो
कि यादों में न पाओ तो नज़र से पूछो।
और
होते भी हैं यारों के ठिकाने कितने॥
जैसे
आये हैं यहाँ वैसे ही जाना होगा।
सच
तो ये ही है मगर इसको भी माने कितने॥
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