नित
नया फिर भी तयशुदा जैसा।
कोई
जज़्बा नहीं वफ़ा जैसा॥
लिख
मुहबत के बोल काग़ज़ पर।
हर
समय हर जगह वो है मौजूद।
उस
का किरदार है हवा जैसा॥
भीड़
में भी अलग दिखे है वह।
उस
का चेहरा है चंद्रमा जैसा॥
क्यों
नहीं खोलते दरीचों को।
हम
को लगता है दम-घुटा जैसा॥
जुट
गया होता काश जीते जी।
वक़्ते-रुख़सत
हुजूम था जैसा॥
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