जो कुछ भी हूँ पर यार गुनहगार नहीं हूँ


जो कुछ भी हूँ पर यार गुनहगार नहीं हूँ।
दहलीज़ हूँ, दरवाज़ा हूँ, दीवार नहीं हूँ॥

छह गलियों से असबाब चला आता है मुझ में।
किस तरह से कह दूँ कि ख़रीदार नहीं हूँ॥

कल भोर का सपना है कोई बोल रहा था।
इस पार ही रहता हूँ मैं उस पार नहीं हूँ॥

सब कुछ हूँ मगर वो नहीं जिस का हूँ तलबगार।
मंज़र हूँ, मुसव्विर भी हूँ, मेयार नहीं हूँ॥

जब कुछ नहीं करता हूँ तो करता हूँ उसे याद।
इस तरह से जीता हूँ कि बेकार नहीं हूँ॥

छह गली - छह इंद्रिय  , असबाब – सामान, तलबगार - ढूँढने वाला / इच्छुक, मंज़र - दृश्य, मुसव्विर - चित्रकार, मेयार – स्तर

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