परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

बर्फ़ अगरचे पिघल रही होगी

 

बर्फ़ अगरचे पिघल रही होगी

बात कर पर ही टल रहेगी

 

आज हम इतना मुस्कुराये हैं

बेकली हाथ मल रही होगी

कहा था जिसको सहेली, उसी ने काट दिया

 

कहा था जिसको सहेली, उसी ने काट दिया 

तुम्हारा नाम तुम्हारी सखी ने काट दिया

 

कहो तो लेप लगा दूँ तनिक वहाँ भी मैं

कटिप्प्रदेश जहाँ करधनी ने काट दिया

बिछाकर रासतों में ख़ार तुमने

 

बिछाकर रासतों में ख़ार तुमने

दुखाया दिल मेरा क्यों यार तुमने

 

ख़याल अब कौन रक्खेगा तुम्हारा

मुझे भी कर दिया बीमार तुमने

न जाने रीत किसने प्रीत की ऐसी बनाई है

न जाने रीत किसने प्रीत की ऐसी बनाई है

ये ऐसा रोग है जिसमें मसीहा ही दवाई है

 

भला ऐसे मरज़ में तंदुरुस्ती कौन चाहेगा

मुहब्बत में तो बस बीमार रहने में भलाई है

तुमको पल-पल सता नहीं सकता

तुमको पल-पल सता नहीं सकता

सच बता कर रुला नहीं सकता

 

सच यही है कि इश्क़ है तुमसे

मैं बहाने बना नहीं सकता

गिनती होती थी जिनकी किरदारों में

 

गिनती होती थी जिनकी किरदारों में

डूब गये पाज़ेबों की झनकारों में

 

एक समय ऐसा भी हमने देखा है

होड़ हुआ करती थी जब ख़ुद्दारों में

किन्हीं हाथों से छीना जा रहा हूँ

 

किन्हीं हाथों से छीना जा रहा हूँ

किन्हीं हाथों में सौंपा जा रहा हूँ

 

मैं ख़ुशबूओं में रहना चाहता था

सो मिट्टी में मिलाया जा रहा हूँ

आदमी के हाथ में पैसे नहीं हैं

 

आदमी के हाथ में पैसे नहीं हैं

दोस्त ये हालात कुछ अच्छे नहीं हैं

 

हम वही हैं शून्य खोजा था जिन्होंने

अब इशारे तक समझ पाते नहीं हैं

देख ले ज़ालिम तेरे हाथों के तोते उड़ गये

 देख ले ज़ालिम तेरे हाथों के तोते उड़ गये
है सलामत इश्क़ नफ़रत के परख़चे उड़ गये
 
चैन से मिलजुल के दाने चुग रहे थे खेत में
इक ज़रा आहट हुई सारे परिन्दे उड़ गये

पहिचान लीजिये न इशारे बहार के

 

पहिचान लीजिये न इशारे बहार के

दहलीज़ पै खड़े हैं नज़ारे बहार के

 

जब-जब भी हमने गेसू सँवारे बहार के

हमको मिले हैं सारे सहारे बहार के

मुझे ये बात परेशान कर रही है बहुत

 

मुझे ये बात परेशान कर रही है बहुत

अना जहान का नुक़्सान कर रही है बहुत

 

भले ही जश्न में तब्दील हो रही है हसद

मगर मुझे तो पशेमान कर रही है बहुत

हँसता और हँसाता है बेबात कभी रोता ही नहीं

 एक ग़ज़ल मुम्बई शहर के नाम 

हँसता और हँसाता है बेबात कभी रोता ही नहीं
सारी दुनिया सो जाये ये शहर कभी सोता ही नहीं
 
हमने इसको हर आगत का स्वागत करते देखा है
किसी की राहों में काँटे ये शहर कभी बोता ही नहीं

अपुन दौनों के ग़म अब एक जैसे रह नहीं पाये

 

अपुन दौनों के ग़म अब एक जैसे रह नहीं पाये

तभी तो आपसे हम दिल की बातें कह नहीं पाये

राज़ खुल भी गया तो क्या होगा

 

राज़ खुल भी गया तो क्या होगा

बस हक़ीक़त से सामना होगा

 

अगली बारिश को मुन्तज़िर है वह

उसका दुख वो ही जानता होगा

वो मुसीबत खड़ी हो गयी है

 

वो मुसीबत खड़ी हो गयी है

हर ख़ुशी मुल्तवी हो गयी है

 

इस क़दर है घुटन ज़िन्दगी में

शायरी लाज़िमी हो गयी है

मज़ाक उड़ाती हुई बेरुख़ी ने काट दिया


मज़ाक उड़ाती हुई बेरुख़ी ने काट दिया 

बवाल दिल में तेरी दिल्लगी ने काट दिया

 

अनेक बार त’अल्लुक़ के तार जोड़े गए

हरेक बार कनेक्शन किसी ने काट दिया

टैटू पै दिल के तीर का टैटू बना दिया

 

टैटू पै दिल के तीर का टैटू बना दिया

माख़ौल जैसी बात को मौजू बना दिया

 

पल भर को तो लगा कि हमीं पर फ़िदा है वह

फिर जल्द ही समझ गए बुद्धू बना दिया

नज़्म - वो अपने मम्मी पापा की बड़ी प्यारी सी इक लड़की

 

वो अपने मम्मी पापा की बड़ी प्यारी सी इक लड़की

मेरे घर को सजाने ब्याह कर जब घर मेरे आयी

तो मैं ने ख़ुद से पूछा इसकी भी कुछ हसरतें होंगी

तमन्नाएं तो मेरी तर्ह इसके दिल में भी होंगी

ये बाबुल के महल को छोड़ कर आयी है मेरे साथ

तुम्हारी ना में जो हाँ है शरारत इसको कहते हैं

तुम्हारी ना में जो हाँ है शरारत इसको कहते हैं
और इस हाँ में जो ना ना है मुसीबत इसको कहते हैं
 
भले लड़ना, झगड़ना, रूठ जाना, पर मनाने पर
गले से आ के लग जाना मुहब्बत इसको कहते हैं 

उदास रात का पिछला पहर बनाती हुई

 

उदास रात का पिछला पहर बनाती हुई

तेरी तलाश बयाबाँ में घर बनाती हुई

 

मैं उजले दिन को भी शब की तरह सजाता हुआ

सियाह शब को मगर तू सहर बनाती हुई