होशो-हवास में भी लगे बदहवास है
इक पल को ना-शनास है इक पल शनास है
उसका वुज़ूद है भी कि वह बस क़यास है
“यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है
वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है”
उसका वुज़ूद है भी कि वह बस क़यास है
“यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है
वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है”
सच तो पता नहीं है मगर जस्ट सोच तो
उस वक़्त ऐसा वाक़या शायद हुआ भी हो
लैला ने ख़ुद ज़लील कराया हो क़ैस को
“मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो
क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है”
शाहों के आलिमों की वक़ालत तो है यही
दावे, दलील में भी हिमायत तो है यही
ख़ास-ओ-खवास की भी नसीहत तो है यही
“माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही
चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है”
लोबान की तरह से न महका करे कोई
कचनार की तरह से न झूमा करे कोई
बारीक़ पैरहन यूँ न पहना करे कोई
“इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई
लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है”
ये ही सुबूत हमको मिला आफ़ताब से
ये ही सबक मिला है हरिक आबो-ताब से
राज़ी ‘नवीन’ भी है ‘निदा’ के जवाब से
“छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से
उतनी ही हर नदी है यहाँ
जितनी प्यास है”
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