परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

तमाम शायर / शायरात के मेरे पसन्दीदा अशआर पर तज़ामीन

 तमाम शायर / शायरात के मेरे पसन्दीदा अशआर पर तज़ामीन

शुजा ख़ावर साहब के शेर पर तज़मीन
तू चाहे जैसा वैसा मत खड़ा हो
लुटाने को असासा मत खड़ा हो
तू बनकर मस्तमौला मत खड़ा हो
“फ़क़ीरे-शह्र सीधा मत खड़ा हो
अमीरे-शह्र छोटा लग रहा है”
 
राजेन्द्र मनचन्दा बानी साहब के शेर पर तज़मीन
न जज़्ब हो सके जज़्बों का हुस्ने-आख़िर था
न लब पै आ सकी बातों का हुस्ने-आख़िर था
फ़लक़ से टूटे सितारों का हुस्ने-आख़िर था
“वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्ने-आख़िर था
कि चुप सी लग गयी दौनों को बात करते हुए”
 
बशीर बद्र साहब के अशआर पर तज़ामीन
सख़्त चौहद्दियाँ रही होंगी
पाँव में बेड़ियाँ रही होंगी
या पशेमानियाँ रही होंगी
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता”
 
मोती मुहब्बतों के बिखर जाएँगे जनाब
ताज़ा हवा के झोंके ठहर जाएँगे जनाब
सपने तमाम आँखों के मर जाएँगे जनाब
“तहज़ीब के लिबास उतर जाएँगे जनाब
डॉलर में यूँ नचाएगी इक्कीसवीं सदी”
 
तुम्हारी हद जहाँ तक है वहीं तक दायरा रखना
वहीं तक राबिता रखना वहीं तक सिलसिला रखना
हमेशा ध्यान मेरे भाई तुम इस बात का रखना
“बड़े लोगों से मिलने में ज़रा सा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समन्दर से मिला दरिया नहीं रहता”
 
वफ़ा के आबशारों को नदी बन कर के बहने दो
कली को फूल बनने के लिए कुछ दर्द सहने दो
हमें ये बात कहनी है हमें ये बात कहने दो
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए”
 
जब भी लफ़्फ़ाज़ी करें लफ़्ज़ों की पैमाइश रहे
आब-रू तब है कि जब बातों में आराइश रहे
ध्यान में हम सबको अपनी अपनी पैदाइश रहे
“दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिन्दा न हों”
 
त ताजिर हैं हम भी न ताजिर हो तुम भी
न शातिर हैं हम भी न शातिर हो तुम भी
जी ताइर हैं हम भी जी ताइर हो तुम भी
“मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी”
 
राहगीरों ने बनायी हैं डगर मालूम है
रास्तों ने ही कराये हैं सफ़र मालूम है
कोई भी शय हो उसे अपना असर मालूम है
“हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रासता हो जाएगा”
 
आदिल मंसूरी साहब के अशआर पर तज़ामीन
न तो रक़्स करती थी दीवार पर
न मन्तर ही जपती थी दीवार पर
ग़ज़ल भी न पढ़ती थी दीवार पर
“जो चुपचाप रहती थी दीवार पर
वो तस्वीर बातें बनाने लगी”
 
उल्फत में सर खपाने का अंजाम ये हुआ
पत्थर से दिल लगाने का अंजाम ये हुआ
उसके ही गीत गाने का अंजाम ये हुआ
“उसके क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ
मैं अपने आप से भी बहुत दूर जा पड़ा”
 
સંસાર સામે હાથને ફેલાવી ના શક્યો
દીવાસળીથી સ્વપ્નને સળગાવી.ના શક્યો
વસ્ત્રો કોઈ હું જાતને પહેરાવી ના શક્યો
ને મૌન દ્વારા વાત હું સમજાવી ના શક્યો
લેવો પડ્યો નછૂટકે આધાર શબ્દનો
 
 
વીંટાવણ પાઘમાં પાછી કદાચ ના આવે
અમારા ભાગમાં પાછી કદાચ ના આવે
તે રંગત ફાગમાં પાછી કદાચ ના આવે
વસંત બાગમાં પાછી કદાચ ના આવે
રહી સહી બધી ખુશ્બૂઓ સાચવી રાખો
 
 
બધાની ખબર એકસરખી અહીં
બધાની ડગર એકસરખી અહી
બધાની કદર એકસરખી અહીં
બધાની કબર એકસરખી અહીં
અહીં કોઈ મોટો કે નાનો નથી
 
 
सागर त्रिपाठी जी के शेर पर तज़मीन
वो अपने फ़र्ज़ से आँखें चुराने को नहीं राज़ी
बनाया है जिसे उसको मिटाने को नहीं राज़ी
जो रौशन है दियाउसको बुझाने को नहीं राज़ी
बस इतनी बात पर माँ शह्र आने को नहीं राज़ी”
अगर वो गाँव छोड़ेगी तो तुलसी सूख जायेगी”
 
अशोक नीरद जी के अशआर पर तज़ामीन
अयाँ होता है जो शायर के लब से
वो आला होता है हर इक सबब से
सों मैं ये इल्तिज़ा करता हूँ सब से
“यहाँ हर बात को सुनिए अदब से
ग़ज़ल की बज़्म है कोठा नहीं है”
 
वाह वाह करने वाली सुहबतों के फेर में
पीठ को खुजाने वाली निस्बतों के फेर में
फ़न के नाम पर फ़ुज़ूल फ़ितरतों के फेर में
क्या से क्या हुए हैं लोग शुहरतों के फेर में
आसमान से जुड़े ज़मीन से उखड़ गये”
 
जॉन एलिया साहब के शेर पर एक तज़्मीन
हरिक परदा गिराती जा रही हो
हरिक दूरी मिटाती जा रही हो
मेरे दिल में समाती जा रही हो
“बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या”

शकेब जलाली साहब के शेर पर एक तज़्मीन
किसी बशर का तो कहना है बस वहाँ बरसे
किसी बशर का ये कहना है बस यहाँ बरसे
किसी किसी का तो कहना है ता-जहाँ बरसे
ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है”
 
 
साहिर लुधियानवी साहब के शेर पर एक तज़्मीन
भले हाथों में दरपन हो पै दिखलाना  हो मुमकिन
सही क्या हैग़लत क्या है ये समझाना  हो मुमकिन
हक़ीक़त क्या है जब लोगों को बतलाना  हो मुमकिन
वो अफ़साना जिसे अंज़ाम तक लाना  हो मुमकिन
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा”
 
बकुल देव साहब के शेर पर एक तज़्मीन
 
ये किस तरह का दौर है उतार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
दिलों पे अन्धकार का दयार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
फ़ज़ाओं पे ख़िज़ाओं का वक़ार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
"नयी रुतों के जिस्म पर ग़ुबार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की"
 
 
नीरज गोस्वामी साहब के शेर पर एक तज़्मीन
 
हयात से चुरा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
निगाहों से बचा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
फ़ुतूर में उठा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
"बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की"
लुफ़्त - Pleasure

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें