एक ग़ज़ल मुम्बई शहर के नाम
हँसता और हँसाता है बेबात कभी रोता ही नहीं
सारी दुनिया सो जाये ये शहर कभी सोता ही नहीं
किसी की राहों में काँटे ये शहर कभी बोता ही नहीं
बोझ आराम-परस्तों का ये शहर कभी ढोता ही नहीं
जोश में आकर होश अपना ये शहर कभी खोता ही नहीं
किसी भी घटना से मायूस ये शहर कभी होता ही नहीं
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