तू ख़ुद भी सोच क्यों सोचूँ किसी को
तसव्वुर में भी क्यों देखूँ
किसी को
तुझे पाकर ज़माना मिल गया है
अब इसके बाद क्यों ढूँढूँ किसी को
ये कैसी शर्त मुझ पर थोप दी है
तुझे पाने को अपनाऊँ किसी को
हरिक दामन में तेरी रहमतें हैं
किसी से किसलिए माँगूँ किसी को
हैं जब दो देह और एक प्राण हम तुम
तो अपने बीच क्यों लाऊँ किसी को
बड़ी मुश्किल से बस दो पल मिले हैं
अब इसके बाद क्यों ढूँढूँ किसी को
ये कैसी शर्त मुझ पर थोप दी है
तुझे पाने को अपनाऊँ किसी को
हरिक दामन में तेरी रहमतें हैं
किसी से किसलिए माँगूँ किसी को
हैं जब दो देह और एक प्राण हम तुम
तो अपने बीच क्यों लाऊँ किसी को
बड़ी मुश्किल से बस दो पल मिले हैं
मैं इक लम्हा भी क्यों दे
दूँ किसी को
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