वफ़ा-परस्ती का क़िस्सा तमाम लिख देते
मुहब्बतों का यही है पयाम
लिख देते
मेरे मकान का हुलिया बिगाड़ने
वालो
तुम इस मकान पै अपना ही नाम लिख देते
तुम इस मकान पै अपना ही नाम लिख देते
वगरना शब को भला यों ही शाम लिख देते
फ़क़ीर कैसे खँडर को मक़ाम लिख देते
सो हम भी कैसे उसे फ़ैज़े-आम लिख देते
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