परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने


ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने।
जैसे पिंजड़े खोल दिये सय्यादों ने॥

उस पत्थर-दिल को शायद मालूम नहीं।
लैला को मशहूर किया फ़रियादों ने॥

दिल के दरवाज़े तलक बू-ए-वफ़ा आने दे

दिल के दरवाज़े तलक बू-ए-वफ़ा 1 आने दे।
धूल उड़ती है तो उड़ने दे - हवा आने दे॥

जाने वाले से भला इतनी मुहब्बत क्यों कर।
दिल की टहनी प कोई फूल नया आने दे॥

गर्मियों की रुत में सावन की घटाएँ ढूँढते हैं




गर्मियों की रुत में सावन की घटाएँ ढूँढते हैं।
नफ़रतों में भी मुहब्बत की फ़ज़ाएँ ढूँढते हैं।।

इस से बढ़कर और क्या होगी मुहब्बत की निशानी।
यार की भूलों में भी अपनी ख़ताएँ ढूँढते हैं।।

कभी तो राहे-मुहब्बत में ये कमाल दिखे

 

कभी तो राहे-मुहब्बत में ये कमाल दिखे।
बिना बताये उसे मेरे दिल का हाल दिखे।

दिल उस की सारी ख़ताएँ मुआफ़ कर देगा।
बस उस की आँखों में इक मरतबा मलाल दिखे॥

किसे मालूम है किस नाम पर आवै



किसे मालूम है किस नाम पर आवै।
चँदरमा क्या पता किस बाम पर आवै।।

सयाने लोग जिसको लुत्फ़ कहते हैं।
वु नश्शा क्या पता किस जाम पर आवै।।

हमसे मिल कर भी मुलाक़ात नहीं करते तुम



हमसे मिल कर भी मुलाक़ात नहीं करते तुम।
ये भी कुछ बात हुई बात नहीं करते तुम।

दर्दो-ग़म हमसे लिपटने को खुद तरसते हैं।
पेश, पर ये भी तो सौगात नहीं करते तुम॥

उदासियों के नगर में उमंग भर जाओ



उदासियों के नगर में उमंग भर जाओ।
कभी तो हमको भी छू कर निहाल कर जाओ।

नहीं बदन को ज़रा सा भी टच नहीं करना।
हमारी रूह से होते हुए गुज़र जाओ।।

ये रोज़-रोज़ का ही रूठना-मनाना क्या


ये रोज़-रोज़ का ही रूठना-मनाना क्या।
मुहब्बतों में सनम जीतना हराना क्या।।

पराई आँखों से जलधार को बहाना क्या।
नहीं है प्यार तो फिर प्यार का बहाना क्या।।

सुख चमेली की लड़ी हो जैसे


सुख चमेली की लड़ी हो जैसे।
और ग़म सोनजुही हो जैसे॥

हमने हर पीर समझनी थी यूँ।
गर्द, शबनम को मिली हो जैसे॥

कितनी बार बताऊँ तुझको कैसा लगता है


कितनी बार बताऊँ तुझको कैसा लगता है।
तेरा चेहरा अच्छा है तो अच्छा लगता है।

पलकों से कुछ नीचे नथ से ऊपर घूँघट रख।

लिख दिया होता अगर हमने तमाशा होता


लिख दिया होता अगर हमने तमाशा होता।
सच कहा होता अगर हमने तमाशा होता।।

सारे ख़त तुमने कलेजे से लगा रक्खे हैं।
ये किया होता अगर हमने तमाशा होता।।

रहे जो आईनों से दूर तो क़दम बहक गये


रहे जो आईनों से दूर तो क़दम बहक गये।
और आईना उठाया तो, कई भरम बहक गये।।

जहानेहुस्न का बड़ा अजीब सा है मस’अला।
ज़रा कहीं हवा चली कि पेचो-ख़म बहक गये।।

जो वफ़ादार हों उन को ही वफ़ादार मिलें


जो वफ़ादार हों उन को ही वफ़ादार मिलें।
हम गुनहगार हैं हम को तो गुनहगार मिलें॥

हम फ़रिश्तों की रिहाइश में न रह पायेंगे।
वे जो इस पार मिले हैं वही उस पार मिलें॥

कोई जोगन बग़ैर साजन के

 
कोई जोगन बग़ैर साजन के,
            शम्अ की तर्ह जल रही होगी।
यह तो लोबान जैसी ख़ुशबू है,
            कोई मीरा पिघल रही होगी॥

सन्त, साधू, फ़क़ीर या दरवेश,
            सबने हमको यही बताया है।

नित नया फिर भी तयशुदा जैसा


नित नया फिर भी तयशुदा जैसा।
कोई जज़्बा नहीं वफ़ा जैसा॥

लिख मुहबत के बोल काग़ज़ पर।
शेर बन जाएगा दुआ जैसा॥

सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ


सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ। 

ख़ुद को इनसान समझने की सज़ा काटूँ हूँ ॥

 

ये जो हरकत है इसे कौन तरक़्क़ी बोले ।

इस की ख़ुशियों के लिये उस का गला काटूँ हूँ ॥


 

भूल बैठा हूँ मैं कुदरत के तवाजुन के उसूल ।

पेड़ की डाल की मानिन्द शिला काटूँ हूँ ॥

 

जब भी धरती की धरोहर पे चलाऊँ कैंची ।

ऐसा लगता है कि शंकर की जटा काटूँ हूँ ॥

 

बाँटता, बेचता रहता हूँ ज़मीं के टुकड़े ।

मेरी औक़ात नहीं फिर भी ख़ला काटूँ हूँ ॥

 

रात दिन करता ही रहता हूँ हवा को ज़ख़्मी ।

अपनी परवाज़ की आरी से हवा काटूँ हूँ ॥

 

सदा = आवाज़, तवाजुन = सन्तुलन, परवाज़ = उड़ान

जो इतना ही गिला है तीरगी से


जो इतना ही गिला है तीरगी 1 से। 

सहर 2 सज कर दिखा दे रौशनी से॥

 

हरा कर तो दिया दिल को जला कर।

मैं चाहूँ और क्या अब आशिक़ी से॥

यूँ रब्त कोई उस का मेरे घर से नहीं था


यूँ रब्त कोई उस का मेरे घर से नहीं था।

पर, पल भी हटा दर्द मेरे दर से नहीं था॥

 

आवारा कहा जायेगा दुनिया में हरिक सम्त।

सँभला जो सफ़ीना किसी लंगर से नहीं था॥

भटक न जाये कहीं और यह दिले-रौशन



भटक न जाये कहीं और यह दिले-रौशन १।
ज़रा इधर भी नज़र कर ऐ मञ्ज़िले-रौशन २॥

सियाह-शब ३ में सफ़ीने ४ कहाँ-कहाँ भटके।
ये जानता ही कहाँ है वो साहिले-रौशन ५॥

उजास भरते हैं लमहों में फ़ैसले इस के।
तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन ६॥

तमाम उम्र सियापों ७ से क्यों उजाली जाय।
जहाँ में और भी तो हैं मसाइले-रौशन ८॥

हमें नहीं तो किसी और को मिले मौक़ा।
किसी के काम तो आये ये महफ़िले-रौशन॥

१ प्रकाशमय हृदय २ प्रकाशमय लक्ष्य, मञ्ज़िल ३ अँधेरी-रात ४ सफ़ीना - बड़ी नाव ५ नदी / समुन्दर का प्रकाशमय किनारा ६ आदिल - न्यायप्रिय व्यक्ति ७ सियापा - शोक ८ मसाइल - समस्याएँ

जाने किसकी लगी है नज़र


जाने किसकी लगी है नज़र।
राह आती नहीं राह पर।।

बेबसी की हदें देखिये।
बह रहे हैं नदी में शजर 1।।

याँ पहुँचकर हुआ तज’रबा।
ये फ़लक 2 तो है बस आँखभर।।

सीढियों पर बिछी है हयात 3।
ऐ ख़ुशी! हौले-हौले उतर।।

चाहे जितने भी होठों पै हो।
झूठ चलता नहीं उम्रभर।। 

हम तो पानी हैं, दरपन नहीं।
कैसे गिनवाएँ अपने हुनर।।

1  पेड़ 2 आकाश 3 ज़िन्दगी