परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

समय है नाम इसका इस समय कुछ भी न बोलेगा

 

समय है नाम इसका इस समय कुछ भी न बोलेगा

गुबारे फूल जायेंगे तो ज़ालिम पिन चुभो देगा


जगाना काम है उसका ज़मीर अब भी है ड्यूटी पर

मगर तू जाग पायेगा अलारम तो जगा देगा

अब आवै तो फ़क़त उसकी ख़बर आवै

अब आवै तो फ़क़त उसकी ख़बर आवै।
सुकूनो-चैन जिसको देखकर आवै।।

हम उसके वासते नीलाम हो जाएँ।
मगर दिलबर में दिलबर तो नज़र आवै।।

भुला दिया है जो तू ने तो कुछ मलाल नहीं


भुला दिया है जो तू ने तो कुछ मलाल नहीं।
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं।।

तेरी ख़मोशी तो तेरा जवाब है लेकिन।
मेरी ख़मोशी किसी के लिए सवाल नहीं।।

मैं वज्ह पूछ ही न सका बेवफ़ाई की


मैं वज्ह पूछ ही न सका बेवफ़ाई की।
थी रस्म आज उस के यहाँ मुँह-दिखाई की।।

क़ातिल बता रहा है नज़र है क़सूरवार।
किस वासते है उस को ज़ुरूरत सफाई की।।

जब ज़माने के फ़सानों के मुक़ाबिल हुए हम


जब ज़माने के फ़सानों के मुक़ाबिल 4 हुए हम।
तब कहीं इश्क़ के इसकूल में दाख़िल हुए हम॥ 

छन-छनन करते हुये आते हो छा जाते हो।
इस अदा ही पै हुज़ूर आपके क़ाइल 1 हुये हम।।

भले ही तुमने प्रीत निभाई सौदा कर के


भले ही तुमने प्रीत निभाई सौदा कर के ।
फिर भी कहो यह क़र्ज़ उतारें हम क्या कर के ॥

दुनिया भर की ख़ुशियाँ हमने वारीं तुम पर ।
तुमने सौंपा सब का दर्द इकट्ठा कर के ॥

नज़र जो चाहती थी वह दिखा क्या


नज़र जो चाहती थी वह दिखा क्या।
निगाहों का सफ़र पूरा हुआ क्या॥

हमारे दरमियाँ जो मर'हले थे।।
उन्हें कोई फ़साना मिल सका क्या॥

तुमने गर नाचीज़ को महफ़िल लिखा था


तुमने गर नाचीज़ को महफ़िल लिखा था।
हमने भी तुमको महे-कामिल लिखा था।।

क्या ज़माना था कि इक-दूजे को हमने । 
ज़िन्दगी का ख़ुशनुमा हासिल लिखा था ।। 

चैन घटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली


चैन घटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली। 

दिल बहुत घबरा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥

 

दिल लगाया दिल दिया दिल को दिलासे भी दिये।

अब समझ में आ रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥

कभी ख़ुशियों का कभी ग़म का सिरा काटूँ हूँ


कभी ख़ुशियों का कभी ग़म का सिरा काटूँ हूँ ।
उसको हमराज़ बनाने की सज़ा काटूँ हूँ।।

ख़ुदकुशी करने का मुझ को भी कोई शौक़ नहीं।
उस की ख़ुशियों के लिये अपना गला काटूँ हूँ ॥

दर्द के हाथों में परचम आ गया

दर्द के हाथों में परचम आ गया ।
बात में लहजा मुलायम आ गया॥

क्या करिश्मे हो रहे हैं आज कल।
आप को आवाज़ दी - ग़म आ गया॥

चढा कर तीर नज़रों की कमाँ पर


चढा कर तीर नज़रों की कमाँ पर। 

हसीनों के क़दम हैं आसमाँ पर॥

 

हरिक लमहा लगे वो आ रहे हैं।

यक़ीं बढता ही जाता है गुमां पर॥

दयार हर घड़ी सुनसान भी नहीं रहता


दयार हर घड़ी सुनसान भी नहीं रहता। 

और अब हमेशा तेरा ध्यान भी नहीं रहता॥

 

चलो ये माना मुहब्बत फ़ुज़ूल है लेकिन।

किसी का होने में नुक़सान भी नहीं रहता॥

बस वही चाँद सितारों को समझ पाते हैं

बस वही चाँद सितारों को समझ पाते हैं।
इश्क़ वाले ही इशारों को समझ पाते हैं।

बेवफ़ाओं से नहीं रखना वफ़ा की उम्मीद।
बेसहारे ही सहारों को समझ पाते हैं।।

बोल-बचनों को सदाचार समझ लेते हैं


बोल-बचनों को सदाचार समझ लेते हैं।

लोग टीलों को भी कुहसार समझ लेते हैं॥

 

दूर अम्बर में कोई चश्म लहू रोती है।

हम यहाँ उस को चमत्कार समझ लेते हैं॥

हमारे बाद हमारा ख़याल रखने को

हमारे बाद हमारा ख़याल रखने को।
किसे बसाओगे दिल में मलाल रखने को।।

सही समय पै मुआफ़िक जवाब मिलते हैं।
बहुत उतावले थे तुम सवाल रखने को।।

निगाह सबकी निगहबानों तक पहुँचती है


निगाह सबकी निगहबानों तक पहुँचती है 

कोई भी प्यास होपैमानों तक पहुँचती है

 

वो एक पल की तलब हो कि ज़िन्दगी भर की

मगर दीवानगी दीवानों तक पहुँचती है

लिखने वाले ने भी क्या-क्या लिक्खा है


लिखने वाले ने भी क्या-क्या लिक्खा है

प्यासे की क़िस्मत में सहरा लिक्खा है


    सागर जैसी आँखों की क़िस्मत देखो

    झरने जैसा पल-पल झरना लिक्खा है

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं।
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥

जिस की आँखों में चहकते और महकते ख़ाब हों।
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥

ख़ूब थी वो मक़्क़ारी, ख़ूब ये छलावा है


ख़ूब थी वो मक़्क़ारीख़ूब ये छलावा है। 

वो भी क्या तमाशा थाये भी क्या तमाशा है॥

 

सोचने लगे हैं अबज़ुल्म के क़बीले भी।

ख़ामुशी का ये दरियाऔर कितना गहरा है॥