समय है नाम इसका इस समय कुछ भी न बोलेगा
गुबारे फूल जायेंगे तो ज़ालिम पिन चुभो देगा
जगाना काम है उसका ज़मीर अब भी है ड्यूटी पर
मगर तू जाग पायेगा अलारम तो जगा देगा
संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)
समय है नाम इसका इस समय कुछ भी न बोलेगा
गुबारे फूल जायेंगे तो ज़ालिम पिन चुभो देगा
जगाना काम है उसका ज़मीर अब भी है ड्यूटी पर
मगर तू जाग पायेगा अलारम तो जगा देगा
चैन घटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली।
दिल बहुत घबरा रहा है क्या
मुसीबत पाल ली॥
दिल लगाया दिल दिया दिल को
दिलासे भी दिये।
अब समझ में आ रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
चढा कर तीर नज़रों की कमाँ पर।
हसीनों के क़दम हैं आसमाँ पर॥
हरिक लमहा लगे वो आ रहे हैं।
यक़ीं बढता ही जाता है गुमां पर॥
दयार हर घड़ी सुनसान भी नहीं रहता।
और अब हमेशा तेरा ध्यान भी
नहीं रहता॥
चलो ये माना मुहब्बत फ़ुज़ूल
है लेकिन।
किसी का होने में नुक़सान भी नहीं रहता॥
बोल-बचनों को सदाचार समझ लेते हैं।
लोग टीलों को भी कुहसार समझ
लेते हैं॥
दूर अम्बर में कोई चश्म लहू
रोती है।
हम यहाँ उस को चमत्कार समझ लेते हैं॥
निगाह सबकी निगहबानों तक पहुँचती है
कोई भी प्यास हो, पैमानों तक पहुँचती है
वो एक पल की तलब हो कि
ज़िन्दगी भर की
मगर दीवानगी दीवानों तक पहुँचती है
लिखने वाले ने भी
क्या-क्या लिक्खा है
प्यासे
की क़िस्मत में सहरा लिक्खा है
सागर जैसी आँखों की क़िस्मत देखो
झरने जैसा पल-पल झरना लिक्खा है
ख़ूब थी वो मक़्क़ारी, ख़ूब ये छलावा है।
वो भी क्या तमाशा था, ये भी क्या तमाशा है॥
सोचने लगे हैं अब, ज़ुल्म के क़बीले भी।
ख़ामुशी का ये दरिया, और कितना गहरा है॥