परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं।
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥

जिस की आँखों में चहकते और महकते ख़ाब हों।
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥

ख़ूब थी वो मक़्क़ारी, ख़ूब ये छलावा है


ख़ूब थी वो मक़्क़ारीख़ूब ये छलावा है। 

वो भी क्या तमाशा थाये भी क्या तमाशा है॥

 

सोचने लगे हैं अबज़ुल्म के क़बीले भी।

ख़ामुशी का ये दरियाऔर कितना गहरा है॥

पहले तो हम को पंख हवा ने लगा दिये


पहले तो हम को पंख हवा ने लगा दिये 

और फिर हमारे पीछे फ़साने लगा दिये  

 

दुनिया हमारे नूर से वैसे भी दंग थी 

और उस पे चार-चाँद पिया ने लगा दिये 

हम ने दर्दों को कलेज़े से लगाया ही नहीं


हम ने दर्दों को कलेज़े से लगाया ही नहीं 

ग़म की अगवानी में कालीन बिछाया ही नहीं

 

प्यार से जो भी मिला हम को रतन जैसा लगा

हम ने फेंके हुए सिक्कों को उठाया ही नहीं

बात पूरी हो न पानी थी, लिहाज़ा टाल दी

बात पूरी हो न पानी थी, लिहाज़ा टाल दी।
ज़िन्दगी फ़िलहाल मौक़े के मुताबिक़ ढाल दी॥

गर मिला मौक़ा तो हम फिर से करेंगे बातचीत।
ये न समझें बात हर दम के लिये ही टाल दी॥

बैद की बाँहों में रह कर भी जो तनहा हो जाऊँ

बैद की बाँहों में रह कर भी जो तनहा हो जाऊँ

इससे अच्छा तो यही है कि मैं अच्छा हो जाऊँ

 

तेरी निस्बत है हयात और अदावत है मौत

देख मत ऐसे कि अल्लाह को प्यारा हो जाऊँ

अगर हैवानियत का ये ही मंज़र कू ब कू होगा

 

अगर हैवानियत का ये ही मंज़र कू कू होगा

ज़मीं पर, तय है, कल पानी होगा, बस लहू होगा

 

सुनो हैवानो मेरा प्रश्न है गर दे सको उत्तर

कि जब पानी नहीं होगा तो फिर किससे वुज़ू होगा

नहीं चढ़ना था पर अब चढ़ चुके हैं

 

नहीं चढ़ना था पर अब चढ़ चुके हैं

जहाँ चढ़ना था साहब चढ़ चुके हैं

 

सुनो री सीढ़ियो आराम कर लो

जिन्हें चढ़ना था वे सब चढ़ चुके हैं

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

              संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

(ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

अब जैसे भी हुई हो भलाई हुई तो है

अब जैसे भी हुई हो भलाई हुई तो है।
नाकामियों ने राह दिखाई हुई तो है॥

इस बार बात बनने के इमकान हैं बहुत।
ग़म के सिवा ख़लिश भी सवाई हुई तो है॥

मरमरी बाँहों पे इस ख़ातिर फ़िदा रहता हूँ मैं

मरमरी बाँहों पे इस ख़ातिर फ़िदा रहता हूँ मैं ।
इन के घेरे में गुलाबों सा खिला रहता हूँ मैं ।।

कुछ करूँ ऐसा कि तुझको खोलने पड़ जाएँ लब । 
बस इसी हसरत से तुझको छेड़ता रहता हूँ मैं ।।  

चहचहाते थे लड़कपन में परिन्दों की तरह


चहचहाते थे लड़कपन में परिन्दों की तरह । 

आजकल राम रटा करते हैं तोतों की तरह ।।

 

अब तो मुश्किल से नज़र भर के कोई तकता है ।

बस टँगे रहते हैं हम चाँद-सितारों की तरह ।।

खाली-पीली वबाल क्या करना


खाली-पीली वबाल क्या करना । 

आओ सीखें मुक़ाबिला करना ।।

 

जिनकी बुनियाद ही मुहब्बत हो ।

उनके हक़ में सदा दुआ करना ।।

जब कि थे बीसियों ज़ाविये रंग में


जब कि थे बीसियों ज़ाविये रंग में।
हम ने ढूँढे फ़क़त मसअले रंग में॥

दीन लफ़्फ़ाज़ियों की बलि चढ गया।
आ गया नुक़्स अच्छे-भले रंग में॥

तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं


तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं ।
दिल तेरी बज़्म को दिलदार सम्हाले हुये हैं ॥

इश्क़ एक ऐसी अदालत है जिसे जनमों से ।
उस के अपने ही गुनहगार सम्हाले हुये हैं ॥

हवा के ज़ोर पे ज़ोर अपना आज़मा कर देख


हवा के ज़ोर पै ज़ोर अपना आज़मा कर देख । 
न उड़ सके तो कम-अज़-कम पतंग उड़ा कर देख ॥ 

फिर इस जहान की मिट्टी पलीद कर देना । 
पर उस से पहले नई बस्तियाँ बसा कर देख ॥

तमाम ख़ुश्क दयारों को आब देता था


तमाम ख़ुश्क दयारों को आब देता था।
हमारा दिल भी कभी आसमान जैसा था॥

अजीब लगती है मेहनत-कशों की बद-हाली।
यहाँ तलक तो मुक़द्दर को हार जाना था॥

काम आना हो तभी काम नहीं आते हैं


काम आना हो तभी काम नहीं आते हैं।
धूप के पाँव दिसम्बर में उखड़ जाते हैं॥

धूल-मिट्टी की तरह हम भी कोई ख़ास नहीं।
बस, हवा-पानी की सुहबत में सँवर जाते हैं॥

ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने


ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने।
जैसे पिंजड़े खोल दिये सय्यादों ने॥

उस पत्थर-दिल को शायद मालूम नहीं।
लैला को मशहूर किया फ़रियादों ने॥