परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

जो कुछ भी हूँ पर यार गुनहगार नहीं हूँ


जो कुछ भी हूँ पर यार गुनहगार नहीं हूँ।
दहलीज़ हूँ, दरवाज़ा हूँ, दीवार नहीं हूँ॥

छह गलियों से असबाब चला आता है मुझ में।
किस तरह से कह दूँ कि ख़रीदार नहीं हूँ॥

कल भोर का सपना है कोई बोल रहा था।
इस पार ही रहता हूँ मैं उस पार नहीं हूँ॥

सब कुछ हूँ मगर वो नहीं जिस का हूँ तलबगार।
मंज़र हूँ, मुसव्विर भी हूँ, मेयार नहीं हूँ॥

जब कुछ नहीं करता हूँ तो करता हूँ उसे याद।
इस तरह से जीता हूँ कि बेकार नहीं हूँ॥

छह गली - छह इंद्रिय  , असबाब – सामान, तलबगार - ढूँढने वाला / इच्छुक, मंज़र - दृश्य, मुसव्विर - चित्रकार, मेयार – स्तर

फ़ानी जहाँ में होनी है अपनी बसर कहाँ


फ़ानी जहाँ में होनी है अपनी बसर कहाँ।
पर इस से बच के जाएँ तो जाएँ किधर, कहाँ॥

हमसे कहो हो प्यार किया रस्म की तरह।
उलफ़त में आप से भी हुई ना-नुकर कहाँ॥

हमने भी कैसी-कैसी नज़ीरों को गढ़ दिया।
शबनम कहाँ है और तेरी चश्मेतर कहाँ॥

ख़्वाबों ने हमको छोड़ा तो यादों ने धर लिया।
तुम से मिले तो पायी फिर अपनी ख़बर कहाँ॥

सच तो यही है जो कि उजालों को खा गयी।
उस रात की हुयी है अभी तक सहर कहाँ॥

उड़-उड़ के जिस ने शहर को बर्बाद कर दिया।
कोई तो बोलो अब है वो उड़ती ख़बर कहाँ॥

बादल बरस रहे हैं मगर नम नहीं ज़मीन।
मौसम तेरे मिजाज़ में अब वो असर कहाँ

थे दस्तरस में जिन की ज़माने, ज़मानों तक।
गुम हो गये हैं यार वे मन के नगर कहाँ॥

अश्क़ों को पौंछ और ज़रा देख ध्यान से।
ले जा रही है तुझको तेरी चश्मे-तर कहाँ॥

फ़ानी - नश्वर / नाशवान, बसर - गुजर-बसर / निर्वाह, नज़ीर - उदाहरण / प्रतीक, चश्मेतर - भीगी आँख [आँसू के संदर्भ में], उल्फ़त – प्रेम, सहर – सुबह,

हजरत अल्ताफ़ हुसैन साहब हाली की ज़मीन “है जुस्तजू कि ख़ूब से है ख़ूबतर कहाँ” पर एक कोशिश


दिल का दामन ख़ुशी से भर डाला


दिल का दामन ख़ुशी से भर डाला।
हाय! फिर से क़ुसूर कर डाला॥

जो इसे करना ही न था आबाद।
तो मुहब्बत में क्यों असर डाला॥

तब ख़ला से निकल सका अमरित।
जब इस अन्धे कुएँ में घर डाला॥  

पूजने होंगे उस के पाँव हमें।
जिस ने भी इश्क़ में हुनर डाला॥

रब को मालूम था ये नादाँ है।
इसलिये ही तो दिल में डर डाला॥

उड़ पड़ा शेर हम ने जैसे ही।
उस में एक लफ़्ज़ चश्मेतर डाला॥

अक्सर ऐसा भी लगता है रब ने।
वाँ जो ख़ारिज़ हुआ, इधर डाला॥

कुल जिरह इस पे है कि पहलेपहल।
पाँव किस ने ज़मीन पर डाला॥

कैसे-कैसे हसीन गुंचे थे।
एक हवस ने सभी को चर डाला॥

हमने सोचा कि ये तो चुहिया है।
ज़िन्दगी ने हमें कुतर डाला॥

ख़ुद से मिल कर ‘नवीन’ लगता है।
हम ने क्यों ओखली में सर डाला॥



ख़ला - रिक्त स्थान, संसार, ब्रह्माण्ड 

कहानी बड़ी मुख़्तसर है


कहानी बड़ी मुख़्तसर १ है।
कोई सीप कोई गुहर २ है॥

बगूलों से उपजे बगूले ३।
हवा तो फ़क़त नोंक भर है॥

फ़क़ीरों को दुनिया की परवा।
अगरचे ४ नहीं है, मगर है॥

तुम्हारा कहा भी सुनेगी।
अभी रूह परवाज़ ५ पर है॥

ठहरते- ठहरते, ठहरते।
ठहरना भी तो इक हुनर है॥

कहो तो यहीं दिन तलाशें।
यहाँ तीरगी ६ पुरअसर ७ है॥



१ संक्षिप्त २ मोती ३ बवण्डर, हवा का गोला / घेरा, चक्रवात ४ हालाँकि ५ उड़ान ६ अँधेरा ७ भरपूर, अत्यधिक

ज़र्रे-ज़र्रे में मुहब्बत भर रही है


ज़र्रे-ज़र्रे में मुहब्बत भर रही है।
क्या नज़र है और क्या जादूगरी है॥

प्यार के पट खोल कर देखा तो जाना।
दिल हिमालय, ख़ामुशी गंगा नदी है॥

हम तो ख़ुशबू के दीवाने हैं बिरादर।
जो नहीं दिखती वही तो ज़िन्दगी है॥

किस क़दर उलझा दिया है बन्दगी ने।
उस को पाएँ तो इबादत छूटती है॥

ये अँधेरे ढूँढ ही लेते हैं हम को।
इन की आँखों में ग़ज़ब की रौशनी है॥

एक दिन हम ने गटक डाले थे आँसू।
आज तक दिल में तरावट हो रही है॥

अफ़साने सच्चे हो गए


अफ़साने सच्चे हो गए।
तो क्या हम झूठे हो गए॥

हम भी तो इनसाँ ही हैं।
हम भी दीवाने हो गए॥

तकते-तकते उस की राह।
आँखों में जाले हो गए॥

इतने जाले पड़ गए हैं।
दीदों 1 के टुकड़े हो गए॥

ऐसी अटकी हैं साँसें।
आहों के सपने हो गए॥

उफ़्फ़! क’नखियों का जादू।
ज़ख़्मों के जलसे हो गए॥

किसे रुला कर आए हो।
किस के दिन पूरे हो गए॥

भाव तुम्हारे गिर गए या।
हम सचमुच महँगे हो गए॥

कहाँ रहे तुम इतने साल।
आईने शीशे हो गए॥



1 दीद – देखना, दर्शन 

कई दिनों से किसी का कोई ख़याल नहीं


कई दिनों से किसी का कोई ख़याल नहीं।
अजीब हाल है फिर भी हमें मलाल नहीं॥

कई दिनों से ये जुमला नहीं सुना हमने।
भले भुला दे मगर कल्ब 1 से निकाल नहीं॥

तेरी ख़मोशी तो तेरा ज़वाब है लेकिन।
मेरी ख़मोशी किसी के लिये सवाल नहीं॥

अब इस से बढ़ के तेरी शान में कहूँ भी क्या।
तेरा कमाल यही है तेरी मिसाल नहीं॥

जनम के बाद दुबारा वली 2 न बन पाये।
क़ज़ा3 के बाद भी ओहदा हुआ बहाल नहीं॥ *

1 दिल 2 सन्त, ज्ञानी 3 मौत

·       संदर्भ चौरासी लाख योनियों के भ्रमान्न के उपरांत घोर तप कर के द्वारा सन्त अवस्था प्राप्त होने पर जीव को प्रभु कृपा से पुन: मनुष्य योनि में जन्म मिलता है परन्तु माया वश जन्म लेते ही नश्वर संसार की माया उसे पुन: पाप-चक्र में ढकेल देती है जिस के फलस्वरूप मनुष्य औसतन पापकर्मों में लिप्त हो कर पुन: चौरासी लाख योनियों के चक्कर में फँस जाने को बाध्य होता है  

कहिये नवीन आप के तेवर कहाँ गये


कहिये नवीन आप के तेवर कहाँ गये।
क़तरे ही दिख रहे हैं - समुन्दर कहाँ गये॥

अब तो हरिक निगाह यही पूछती है बस।
वे पल जो कल तलक थे मयस्सर
 - कहाँ गये॥

साहिल पे सर पटक के कोई चीखता है रोज़।
मुझ को हराने वाले शनावर कहाँ गये॥

रस्मोरिवाज़, इल्म, शराफ़त, मुहब्बतें।
दुनिया बनाने वाले वे आज़र कहाँ गये॥

मुमकिन है कल  ख़याल उठा दें न ये सवाल।
सर करते थे जो हम को वे लश्कर कहाँ गये॥

सय्याद कर रहे हैं चमन वालों से सवाल।
छतरी से उड़ के सारे कबूतर कहाँ गये॥

हम तो यहीं  खड़े हैं मगर आप ऐ 'नवीन'।
बुझते हुये दियों को जला कर कहाँ गये॥

मयस्सर - हासिल, उपलब्ध; शनावर - तैराक; आज़र - शिल्पी, किसी वास्तु-शिल्प आदि को बनाने-सजाने वाले

जो दुनिया का ढब है ख़ुद भी वैसा कर के


जो दुनिया का ढब है ख़ुद भी वैसा कर के।
कहाँ जाएँ अपने जैसों को तनहा कर के॥

मुरलीवाले बैर हमारा मुरली से था।
तू क्यों छोड़ गया है ब्रज को सूना कर के॥

रोज़ सुबह तेरी तसवीर सजाते हैं हम।
खिल जाता है दिल दिलबर की पूजा कर के॥

बुनते-बुनते प्रीत-चदरिया बुन पाई है।
गँवा न देना इसको रेज़ा-रेज़ा कर के॥

तू ही बतला दे तुझ तक कैसे पहुँचें हम। 
तूने अपना मोल रखा है ऊँचा कर के॥

अब इस से बढ के भला क्या कमाल होना है


अब इस से बढ के भला क्या कमाल होना है।
हमें ही अगली सदी का सवाल होना है॥

हम उस पतंगे 1 की मानिन्द ही तो हैं जिस का।
विसाल 2 होते ही बस इन्तक़ाल 3 होना है॥

हम इस जहान के सबसे बड़े नजूमी 4 हैं।
हमें पता है कहाँ-कब हलाल होना है॥

सब अपने-अपने क़बीलों को इत्तला कर दो।
सभी को सब के लिये इस्तेमाल होना है॥

तरक़्क़ियों को तलाशा तो ये समझ आया।
किसे ग़रीब किसे मालामाल होना है॥

ये वो गुलिस्ताँ नहीं है सभी को है मालूम।
मगर तमाशा अभी डाल-डाल होना है॥

चलो यहाँ से रिहाई का इन्तज़ाम करें।
यहाँ तो रोज़ नया एक वबाल होना है॥

कमाल ही तो कहा जायेगा ‘नवीन’ तुम्हें।
मिसाल बख़्शे बिना बे-मिसाल होना है॥



1 कीट ( यहाँ नर मधुमक्खी के लिये प्रयुक्त) 2 मिलन 3 मृत्य 4 ज्योतिषी, भविष्यवक्ता 

ज़िन्दगी तेरे लिये और बहाने कितने


ज़िन्दगी तेरे लिये और बहाने कितने।
एक तमाशे के लिये और तमाशे कितने॥ 

बाँह फैलाये हुये कब से खड़ा है महबूब।
रूह बदलेगी बदन और न जाने कितने॥

आग पानी से बचाओ तो हवा की दहशत।
ज़िन्दगी अक्स बनाये तो बनाये कितने॥

जो कि यादों में न पाओ तो नज़र से पूछो।
और होते भी हैं यारों के ठिकाने कितने॥

जैसे आये हैं यहाँ वैसे ही जाना होगा।
सच तो ये ही है मगर इसको भी माने कितने॥

होश में थे फिर भी जाने क्या समझ बैठे थे हम

होश में थे फिर भी जाने क्या समझ बैठे थे हम । 
बादलों को नूर का चेहरा समझ बैठे थे हम ।। 

किस के सर पर ठीकरा फोड़ें अब इस भटकाव का । 
दूर की हर चीज़ को आला समझ बैठे थे हम ।। 

हाल ये होना ही था तालीम और तहज़ीब का । 
लग्ज़िशों को रक़्स का हिस्सा समझ बैठे थे हम ।। 

जिस में कुछ अच्छा दिखा उस के क़सीदे पढ़ दिये । 
एरे-गैरों को भी अल्लामा समझ बैठे थे हम ।। 

जो भी कुछ सामान है तन में समाता है ‘नवीन’ । 
जो समंदर है, उसे दरिया समझ बैठे थे हम ।। 

तालीम – शिक्षा, तहज़ीब – संस्कार, लग्जिश – फिसलना / रपटना , रक़्स – नृत्य, क़सीदे – गुणगान, अल्लामा – [बड़ा] विद्वान,

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगोशियाँ मिलीं

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगोशियाँ मिलीं।
तब जा के इस दयार को ख़ुशफ़हमियाँ मिलीं।।

सूरज ने चन्द्रमा को उजालों से भर दिया।
हासिल ये है कि रात को परछाइयाँ मिलीं।।

अब्रों 1 ने ज़र्रे-ज़र्रे 2 को पानी से धो दिया।
बाद उस के आसमान को बीनाइयाँ 3 मिलीं।।

दैरो-हरम 4 हों वो या बयाबाँ, हरिक जगह।
शेखी बघारती हुई अय्याशियाँ मिलीं।।

उड़ते हुये परिन्द - हमारी 'व्यथा' न पूछ।
दरकार शाहराह 5 थी - पगडण्डियाँ मिलीं।।

क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त 6 को वो मिला।
इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं।।

जब-जब किया है वक़्त से हमने मुक़ाबला।
उस को बुलन्दियाँ हमें गहराइयाँ मिलीं।।

रहमत का राग अपनी जगह ठीक है मगर।
जिसने पसारा हाथ उसे रोटियाँ मिलीं।।

कितने ही नौज़वान ज़मींदोज़ हो गये।
वो तन हैं ख़ुशनसीब जिन्हें झुर्रियाँ मिलीं।।

हमने दिले-फ़क़ीर टटोला तो क्या बताएँ।
ख़ामोशियों से तंग परेशानियाँ मिलीं।।

तुम को बता रहा हूँ किसी को बताना मत।
ख़ुद को किया ख़राब तभी मस्तियाँ मिलीं।।

सौ-फ़ीसदी मिठास किसी में नहीं 'नवीन'।
जितनी ज़बाँ हैं सब में कई गालियाँ मिलीं।।


1 बादलों 2 कण-कण 3 दृष्टि, नज़र 4 मन्दिर-मस्जिद 5 राजमार्ग, हाइवे ६  मेहनत 

ख़ुद अपनी ख़्वाहिशों के वासते जो अड़ नहीं सकता


ख़ुद अपनी ख़्वाहिशों के वासते जो अड़ नहीं सकता।
ज़माने से लड़ेगा क्या, जो खुद से लड़ नहीं सकता।।

तरक़्क़ी चाहिए तो बन्दिशें भी तोड़नी होंगी।
अगर लंगर पड़ा हो तो सफ़ीना बढ़ नहीं सकता।।

शराफ़त की हिमायत शायरी में ठीक लगती है।
सियासत में भले लोगों का झण्डा गड़ नहीं सकता।।

अब अच्छा या बुरा, जैसा भी है ये मूड है मेरा।
अगर मैं छोड़ दूँ इस को तो ग़ज़लें पढ़ नहीं सकता।।

मकानों के नगर में हम अगर कुछ घर बना लेते


मकानों के नगर में हम अगर कुछ घर बना लेते।
तो अपनी बस्तियों को स्वर्ग से बढ़ कर बना लेते॥

हमें अपने इलाक़ों से मोहब्बत हो नहीं पाई।
वगर्ना ज़िंदगी को और भी बेहतर बना लेते॥

समय से लड़ रहे थे और लम्हे कर दिए बरबाद।
हमें करना ये था लम्हात का लश्कर बना लेते॥

ग़नीमत है कि जंगल के उसूलों को नहीं माना।
वगर्ना आशियानों को अजाइब-घर बना लेते॥

अगर सौदा ही करना था उसे तो बोल तो देता।
मोहब्बत के लिए हम दिल को भी दफ़्तर बना लेते॥

हवस हैराँ न कर पाती तलब तन्हा न कर पाती।
अगर हम हसरतों को प्यार का सागर बना लेते॥

कहीं ऐसा जो हो पाता कि लड़ते ही नहीं हम तुम।
बहुत मुमकिन था हर कंकर को शिव-शंकर बना लेते॥