परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

अँधेरा शब-ढले आराम फ़रमाता नहीं है क्यों

अँधेरा शब-ढले आराम फ़रमाता नहीं है क्यों।
मेरी दुनिया में तेरा आफ़ताब आता नहीं है क्यों॥

न जाने कब से तेरी गोद में रक्खा है मेरा सर।
पिता बन कर तू मेरे सर को सहलाता नहीं है क्यों॥

मैं बच्चा हूँ तो जाहिर है बि’नटना काम है मेरा।
ये तुझ पर फ़र्ज़ है तू मुझ को बहलाता नहीं है क्यों॥

अरे उलझाने वाले और अब उलझायेगा कितना।
तू अपनी जुल्फों की गुरगाँठ सुलझाता नहीं है क्यों॥

कुसूर उस का है लेकिन आज ये मैं तुझ से पूछूँगा।
वो मेरा भाई मेरे जैसा बन पाता नहीं है क्यों॥

हम आँसू हैं तो आँखों से टपकते क्यों नहीं आख़िर।
हमारा जन्म लेना काम कुछ आता नहीं है क्यों॥

‘नवीन’ उस आसमाँ से इस ज़मीं तक तू ही तू है तो।
मेरे मौला ग़रीबों पर तरस खाता नहीं है क्यों॥

मन मुताबिक़ इस तरह कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’

मन मुताबिक़ इस तरह कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’।
पोर भर की डोर को रस्सी नहीं कहते ‘नवीन’॥

हास और परिहास बढ कर बन रहा है अट्टहास ।
इस विनाशक तत्व को मस्ती नहीं कहते ‘नवीन’॥

इस लिये ही तो हमारी बेटियाँ खतरे में हैं।
छेड़ने वालों को हम कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’॥

किस तरह कोई करेगा इस ज़माने का इलाज।
लोग बीमारी को बीमारी नहीं कहते ‘नवीन’॥

हम वली* हैं हम कलन्दर कोई हम जैसा नहीं ।
और सब कहते हैं बस तुम ही नहीं कहते ‘नवीन’॥

अब तखल्लुस* में तुम अपना नाम जड़ना छोड़ दो।
दूसरे की शर्ट को अपनी नहीं कहते ‘नवीन’॥

* महान सन्त
* शायर का उपनाम / छप्प

नहीं नहीं ये नहीं कि हम उस का दर भूल गये

नहीं नहीं ये नहीं कि हम उस का दर भूल गये।
सच तो ये है साहब हम अपना घर भूल गये॥

उस पनिहारिन की अँखियों ने यूँ मदहोश किया।
पैराहन तो ले आये हैं पैकर भूल गये॥

यार उसे खोने की हिम्मत हम में है ही नहीं।
किसे भुलाना है ये भी हम अक्सर भूल गये॥

उसने कुछ बोला तो था जाने क्या बोला था।
लबों की लग्जिश याद है केवल, आखर भूल गये॥

उन ही के दम से तो मरीज़ मरज़ पै हावी है।
कैसे कहें उस की बातों के नश्तर भूल गये॥

बेदम और उदास भी थे पर फ़लक तेरी ख़ातिर।
आन पड़ा तो हम अपने बालोपर भूल गये॥

और भला किस की हिम्मत वो तो है हमारा दिल।
भूलने वाले हम को जिस की शह पर भूल गये॥

जितने शेर सुना कर ख़ुद को शायर समझे हम।
उतने शेर तो कहने वाले कह कर भूल गये॥

आप की दुश्वारी का इतना सा कारन है ‘नवीन’।
आप को रहजन याद रहे बस – रहबर भूल गये॥

ढीठ, ख़ुदगरज़ी नहीं तो क्या कहें

ढीठ, ख़ुदगरज़ी नहीं तो क्या कहें।
दिल को सौदाई नहीं तो क्या कहें॥

ऐ ज़माने तू ही बतला दे, तुझे।
हम, तमाशाई नहीं तो क्या कहें॥

रह्म आता ही नहीं हम पर जिसे।
उस को हरजाई नहीं तो क्या कहें॥

वो तेरी भाभी है पगले, हम उसे।
तेरी भौजाई नहीं तो क्या कहें॥

वॅाटसप और फेसबुक वाली चिराँध।
तुझ को बलवाई नहीं तो क्या कहें॥

जिस को देखो वो ही चैटिंग कर रहा।
इस को तनहाई नहीं तो क्या कहें॥

काम तो कुछ भी नहीं पर व्यस्त हैं।
इस को लुक्खाई नहीं तो क्या कहें॥

तुम हमें जी में जो आये वह कहो।
हम तुम्हें भाई नहीं तो क्या कहें॥

तुम ने भी ठुकरा दिया हम को 'नवीन'।
इस को उपलब्धी नहीं तो क्या कहें॥

सितमगर की ख़मोशी को भले जुल्मो-सितम कहना

सितमगर की ख़मोशी को भले जुल्मो-सितम कहना।
पर उस की मुस्कुराहट को तो लाज़िम है करम कहना॥

मुहब्बत के फ़रिश्ते अब तो इस दिल पर इनायत कर।
लबों को आ गया है ख़ुश्क-आँखों को भी नम कहना॥

हमें तनहाई के आलम में अक्सर याद आता है।
किसी का ‘अल्ला-हाफ़िज़’ कहते-कहते ‘बेस्स्शरम’ कहना॥

हमें गूँगा न समझें हम तो बस इस वासते चुप हैं।
सभी के हक़ में है असली फ़साना कम से कम कहना॥

सनातन काल से जिस बात का डर था – हुआ वो ही।
बिल-आख़िर बन गया फ़ैशन दरारों को धरम कहना॥

अक़ीदत के सिवा शाइस्तगी भी चाहिये साहब।
कोई फ़ोर्मेलिटी थोड़े है ‘वन्दे-मातरम’ कहना॥

अगरचे मान्यवर कहने से कुछ इज़्ज़त नहीं घटती।
मगर हम चाहते हैं आप हम को मुहतरम कहना॥

थे ख़ुद ही के हिसार में

थे ख़ुद ही के हिसार में ।
सो लुट गये बहार में ।।

क्या आप भी ज़हीन थे ।
आ जाइये क़तार में ।।

नश्शा उतर गया तमाम ।
कुछ बात है उतार में ।।

गर तुम नहीं तो ग़म मिला ।
इतने नहीं हैं मार में ।।

लाखों में आप एक थे । 
अब भी हैं इक हज़ार में ।। 

ये दिन भी देख ही लिया । 
पानी नहीं कछार में ।।

सारा शरीर खुल गया । 
झरने की एक धार में ।। 

आवाज़ दीजिये किसे । 
इस रात के बुखार में ।। 

संसार में कोई भी हो सब को रवानी चाहिये

संसार में कोई भी हो सब को रवानी चाहिये।
पानी को धरती चाहिये धरती को पानी चाहिये॥

इज़्ज़त कमानी चाहिये इज़्ज़त बचानी चाहिये।
नज़रों में उठने के लिये नज़रें झुकानी चाहिये॥

ऐ जाने वाले तू कोई तस्वीर देता जा हमें ।
सब कुछ भुलाने के लिए कुछ तो निशानी चाहिये॥

बेशक़ ये ऐसा बाग़ है जिस का कोई सानी नहीं।
लेकिन हुज़ूर अब इस चमन को बाग़वानी चाहिये॥

उस पीर को परबत हुए काफ़ी ज़माना हो गया।
उस पीर को अब नई-नवेली तर्जुमानी चाहिये॥

हम जीतने के ख़्वाब आँखों में सजायें किस तरह।
लश्कर को राजा चाहिए राजा को रानी चाहिये॥

कुछ भी नहीं ऐसा कि जो उसने हमें बख़्शा नहीं।
हाजिर है सब कुछ सामने बस बुद्धिमानी चाहिये॥

लाजिम है ढूँढें और फिर बरतें सलीक़े से उन्हें।
हर लफ्ज़ को हर दौर में अपनी कहानी चाहिये॥

इस दौर के बच्चे नवाबों से ज़रा भी कम नहीं।
इक पीकदानी इन के हाथों में थमानी चाहिये॥

हर बाप के दिल का यही अरमान होता है 'नवीन'।
ससुराल में भी उस की लाड़ो मुस्कुरानी चाहिये॥

हाँ जी हम बेशक़ ऐसा कर सकते थे

हाँ जी हम बेशक़ ऐसा कर सकते थे।
रोज़ नया भगवान खड़ा कर सकते थे॥

वो तो मिट्टी ने ही रोक लिया वरना।
हम भी चादर को मैला कर सकते थे॥

हवा ने अपने होश नहीं खोये वरना।
तिनके! बहुतों को अन्धा कर सकते थे॥

जिस के मुसकाने से मुसकाते हैं हम।
उस को हम कैसे रुसवा कर सकते थे॥

हम ही से परहेज़ न हो पाये वरना।
कई बैद हम को अच्छा कर सकते थे॥

रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे

रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे।
यानि अब तक भुला रहा है मुझे॥

वो भी तो वक़्त का सताया है।
फिर भला क्यों सता रहा है मुझे॥

अब रिहाई बहुत ज़ुरूरी है।
कोई आवाज़ दे रहा है मुझे॥

ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
कौन साहिल प लिख रहा है मुझे॥

दिन-ब-दिन दर्द में इज़ाफ़ा है।
चैन मिलता ही जा रहा है मुझे॥

कारोबारे-चमन उरूज प है।
ग़म गटकता ही जा रहा है मुझे॥

इश्क़ जैसा चतुर नहीं कोई।
मुफ़्त-रुज़गार दे गया है मुझे॥

दिन ख़सारों के लद चुके साहब।
अब तो हर नुक़्स में नफ़ा है मुझे॥

मेरे नक़्क़ाद2 ऐ मेरे भगवान।
जो मिला आप से मिला है मुझे॥

रात बरसाये धूप को शायद।
दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥

उस की महफ़िल मकानो-घर के सिवा।
उस का बाज़ार भी पता है मुझे॥

यों ही खारा नहीं बना हूँ मैं।
तजरबों ने बहुत चखा है मुझे॥

सब के अन्दर ख़ुदा का मन्दर है।
उफ़ ये कैसा मुग़ालता3 है मुझे॥

कोई अम्बर भले रहे मग़रूर।
कोई ज़र्रा तो पा चुका है मुझे॥

इक ‘नवीन’ आसमान और भी है।
इक सुराग़ और मिल गया है मुझे॥



1 स्पर्श 2 आलोचक / टीकाकार 3 ग़लत-फ़ह्मी

महफ़िलों को गुज़ार पाये हम

महफ़िलों को गुज़ार पाये हम।
तब कहीं ख़लवतों पे छाये हम॥

हैं उदासी के कोख-जाये हम।
ज़िन्दगी को न रास आये हम॥

खाद-पानी बना दिया ख़ुद को।
सिलसिलेवार लहलहाये हम॥

नस्ल तारों की जिद लगा बैठी।
इस्तआरे उतार लाये हम॥

रूह के होंठ सिल के ही माने।
हरकतों से न बाज़ आये हम॥

फ़र्ज़ हम पर है रौशनी का सफ़र।
नूर की छूट के हैं जाये हम॥

‘प्यास’ को ‘प्यार’ करना था केवल।
एक अक्षर बदल न पाये हम॥

बस हमारे ही साथ रहती है।
क्यों उदासी को इतना भाये हम॥

अब तो सब को ही मिलना है हमसे।
छायीं तनहाइयाँ, कि छाये हम॥

शहर में आ के तुम चले भी गये।
थे पराये, रहे पराये हम॥

हम अपने दर्द को इस तर्ह से भुलाते हैं

हम अपने दर्द को इस तर्ह से भुलाते हैं।
ख़ुद अपने आप ही अपना मज़ाक़ उड़ाते हैं॥

ये चोटियाँ हैं रिबन पर कि चोटियों प रिबन।
किसी को अब भी ख़यालों में हम चिढ़ाते हैं॥

लिहाफ़ अश्क़ों से तर है मगर ज़ुबाँ ख़ामोश।
दीवाने आज भी दुनिया से ख़ौफ़ खाते हैं॥

किसी की याद ने बरबाद कर दिया होता।
ख़ुदा का शुक्र है लमहे ठहर न पाते हैं॥

नफ़स१ को जैसे ही छूती हैं गुनगुनी यादें।
नज़र के दर पे समुन्दर गदर मचाते हैं॥

जहाँ फ़लक२ से ज़मीं पर अज़ाब३ उतरे थे।
कुछ एक लम्स४ वहाँ अब भी छटपटाते हैं॥

हज़ार बार कहा था कि भूल जाओ 'नवीन'।
पर आप सुनते कहाँ हैं - फ़क़त सुनाते हैं॥



१ साँस २ आसमान ३ मुसीबतें / यातनाएँ ४ स्पर्श

तुम्हारी याद के सावन जब आहें भरते हैं

तुम्हारी याद के सावन जब आहें भरते हैं।
हम आँसुओं के हिंडोलों में ऐश करते हैं॥

हवा सिसकती है अब्रों की ओट में छुप कर।
तुम्हारे लम्स का जब उस से ज़िक्र करते हैं॥

जो देखते हैं उन्हें भी बहा के ले जाएँ।
ग़मों के दरिया इस अन्दाज़ से उतरते हैं॥

मुहब्बतों का हुनर सब के बस की बात नहीं।
फिसलनी सत्ह पे कम ही क़दम ठहरते हैं॥

डगर-डगर पे नगर की बशर-बशर है उदास।
गुहर बिखरने लगें तो बहुत बिखरते हैं॥



हिंडोला - एक तरह का झूला, अब्र - बादल, लम्स - स्पर्श, बशर - मनुष्य, गुहर - मोती

रोज़ ही करती हैं ऐलाने-सहर

रोज़ ही करती हैं ऐलाने-सहर।
ओस की बूँदें मुलायम घास पर॥

रात भर टूटे थे इतने कण्ठ-हार।
सुब्ह तक पत्तों से झरते हैं गुहर॥

बस ज़रा अलसाई थीं कोमल कली।
बाग़ में घुस आये बौराये-भ्रमर॥

भोर की शीतल-पवन अलसा चुकी।
धूप से चमकेगा अब सारा नगर॥

इस का इस्तेमाल कर लीजे हुजूर।
धूप को तो होना ही है दर-ब-दर॥

वाह री सीली दुपहरी की हवा।
जैसे मिलने आ रहे हों हिम-शिखर॥

इक सितारा आसमाँ से गिर पड़ा।
चाँद को ये भी नहीं आया नज़र॥

बाग़ तो ढेरों हैं मेरे शह्र में।
बस वहाँ पञ्छी नहीं आते नज़र॥

सोचता हूँ देख कर ऊँचा गगन।
एक दिन जाना है वाँ सब छोड़ कर॥

बह रही है इस सलीक़े से हवा

बह रही है इस सलीक़े से हवा।
एक भी पत्ता नहीं अलसा रहा॥

शेर की कुर्सी बिल-आख़िर छिन गयी।
पेड़ पर चढ़ना ही सब कुछ हो गया॥

फ़िक्र करते ही नहीं उड़ते परिन्द।
चोंच से कुछ गिर गया तो गिर गया॥

धान की नस्लें उठा कर देख लो।
फ़स्ल ने हर बूँद को लौटा दिया॥

परबतों को थोड़े ही मालूम है।
कौन झरना किस नदी में जा मिला॥

जब दरख़्तों की जड़ें तक जल गईं।
घास का मैदान क्या बचता भला॥

कल ही पिंजड़े से छुड़ाया था जिसे।
वो कबूतर भी ज़मीं पर आ गिरा॥

वो जो रुत जवाँ थी हम से, वो ही रुत सजा दुबारा

वो जो रुत जवाँ थी हम से, वो ही रुत सजा दुबारा।
उसी रात की क़सम है, वो ही गीत गा दुबारा॥

वो जो बेक़रारियाँ थीं, वो ही ढो रही थीं मुझ को॥
ये सुकूँ है मेरा दुश्मन, मेरा दिल दुखा दुबारा॥

कहाँ गुल किसी चमन के, ग़मेदिल को जानते हैं।
वो जवाब दे ही देता, मैं जो पूछता दुबारा॥

बड़ी मुश्किलों से मैंने, शम्मओं के सर ढँके थे।
मेरे सर पे आ पड़ा है, वो ही मसअला दुबारा॥

तेरे दर पे सर टिका कर, तुझे सौंपना है ख़ुद को।
मैं भटक गया हूँ रस्ता, मुझे दे पता दुबारा॥

दिले-नाशाद को रूदाद के मौक़े दे दे

दिले-नाशाद को रूदाद के मौक़े दे दे।
हम सँभल जाएँगे फ़रियाद के मौक़े दे दे॥

तू किसी शय में उतर कर ही मदद करता है।
ऐ ख़ुदा! हम को भी इमदाद के मौक़े दे दे॥

अपने हाथों से परिन्दों को करेगा आज़ाद।
सिर्फ़ सय्याद को फ़रहाद के मौके दे दे॥

राहे-बेख़ुद से तुझे हम को हटाना है अगर।
तो हमें बेख़ुदी के बाद के मौक़े दे दे॥

जिस के आते ही सिहर उठ्ठें बदन-रूहो-ज़मीर। 
हर गुनहगार को उस याद के मौक़े दे दे॥

जिस को सुनते ही पिघल जाये ज़माने का दिल। 
उस ‘नवीन’ आह को ईज़ाद के मौक़े दे दे॥