दिले-नाशाद को रूदाद के मौक़े
दे दे।
हम सँभल जाएँगे फ़रियाद के मौक़े
दे दे॥
तू किसी शय में उतर कर ही मदद
करता है।
ऐ ख़ुदा! हम को भी इमदाद के मौक़े
दे दे॥
अपने हाथों से परिन्दों को करेगा आज़ाद।
सिर्फ़ सय्याद को फ़रहाद के मौके
दे दे॥
राहे-बेख़ुद से तुझे हम को हटाना
है अगर।
तो हमें बेख़ुदी के बाद के मौक़े
दे दे॥
जिस के आते ही सिहर उठ्ठें बदन-रूहो-ज़मीर।
हर गुनहगार को उस याद के मौक़े
दे दे॥
जिस को सुनते ही पिघल जाये ज़माने
का दिल।
उस ‘नवीन’ आह को ईज़ाद के मौक़े
दे दे॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें