वगरना दर्ज़ हैं संडे कई कैलेंडर में
परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी
परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी
संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)
कहा था तुमने गये साल भी दिसम्बर में
वगरना दर्ज़ हैं संडे कई कैलेंडर में
उसको तपना ही पड़ता है जो सबपर शैडो करता है
साफ़ पता चल जाता है कि वो किसको फॉलो करता है
दिखे न भीड़ यहाँ तो करो मलाल नहीं
सनम उसी को मिला जो हुआ निढाल नहीं
अगर अपना समझते हो तो फिर नखरे दिखाओ मत
भले ही फोड़ दो मटुकी भले ही लूट लो माखन
मगर प्राणों से प्यारे तुम हमारा दिल दुखाओ मत
इनायत इसको कहते हैं मुरव्वत इसको कहते हैं
मेरे भाई मेरे दिलदार दौलत इसको कहते हैं
दिलों को जोड़ने वाले अगर हैं भी तो कितने हैं
हमारे हाथ में हीरे अगर हैं भी तो कितने हैं
नयी रुत के मसाले बस वहीं हैं
जहाँ तुम हो उजाले बस वहीं हैं
बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
अमीरे-शह्र भी सचमुच ग़रीब लगता है
पढ़ाई सी ए की हो या मुहब्बतों वाली
ये ऐसे कोर्स हैं जिनमें नसीब लगता है
यों ही फ़ाक़ों पर भला कबतक गुज़ारा हो हुज़ूर
यों ही फ़ाक़ों पर भला कबतक गुज़ारा हो
हुज़ूर
कोई तो हम बेसहारों का सहारा हो हुज़ूर
हम जो टूटे तो सभी ने क्रॉस कर लीं
उँगलियाँ
ज्यूँ हमारा ग़म कोई टूटा सितारा हो हुज़ूर
ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने को
ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने
को
हमारे नाम से मन्सूब कर डाला फ़साने को
मुहब्बत से हसद की आग बुझ सकती है पर
दुनिया
नई ईज़ाद करती है पुरानी को बुझाने को
परबत बाग़ बगीचे नदियाँ मेरे चारों ओर
परबत बाग़ बगीचे नदियाँ मेरे चारों ओर
बिखरी पड़ी हैं कितनी ख़ुशियाँ मेरे चारों ओर
इन ही के हाथों में हैं जादू वाली छड़ियाँ
खेलती रहती हैं जो परियाँ मेरे चारों ओर
यूँ तो वो बिल्कुल पानी के जैसा था
ब-यादे इरशाद खान सिकन्दर
यूँ
तो वो बिल्कुल पानी के जैसा था
लेकिन
उसपर रंग नहीं चढ़ पाता था
रूह
थिरकने लगती थी सुनकर उसको
बानी में इक ढोल खड़कता रहता था
विसालो-हिज़्राँ की नद्दियों की रवानियों में हमारा क्या है
विसालो-हिज़्राँ की नद्दियों की रवानियों में हमारा क्या है
सनम हैं तो हम भी हैं वगरना कहानियों में हमारा क्या है
जो खंडरों को सजा रही है हम उस उदासी के हैं शहंशा’
महल दुमहलों में रक़्स करती वीरानियों में हमारा क्या है
ख़ुश्क सहराओं की तक़दीर बदल आते हैं
ख़ुश्क सहराओं की तक़दीर बदल आते हैं
क्या किया जाय मुक़द्दर में लिखी है कुटिया
यों तो अपने भी ख़यालों में महल आते हैं
उस की उन मदभरी आँखों में हया भरते हुये
हवा का हाथ परों से जो मैं बँटाता हूँ
बर्फ़ अगरचे पिघल रही होगी
बर्फ़ अगरचे पिघल रही होगी
बात कर पर ही टल रहेगी
आज हम इतना मुस्कुराये हैं
बेकली हाथ मल रही होगी
कहा था जिसको सहेली, उसी ने काट दिया
कहा था जिसको सहेली, उसी ने काट दिया
तुम्हारा नाम तुम्हारी सखी ने काट दिया
कहो तो लेप लगा दूँ तनिक वहाँ भी मैं
कटिप्प्रदेश जहाँ करधनी ने काट दिया
बिछाकर रासतों में ख़ार तुमने
बिछाकर रासतों में ख़ार तुमने
दुखाया दिल मेरा क्यों यार तुमने
ख़याल अब कौन रक्खेगा तुम्हारा
मुझे भी कर दिया बीमार तुमने
न जाने रीत किसने प्रीत की ऐसी बनाई है
न जाने रीत किसने प्रीत की ऐसी बनाई है
ये ऐसा रोग है जिसमें मसीहा ही दवाई है
भला ऐसे मरज़ में तंदुरुस्ती कौन चाहेगा
मुहब्बत में तो बस बीमार रहने में भलाई है