ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने
को
हमारे नाम से मन्सूब कर डाला फ़साने को
मुहब्बत से हसद की आग बुझ सकती है पर
दुनिया
नई ईज़ाद करती है पुरानी को बुझाने को
नहीं तैयार लेकिन माह-रू चिलमन हटाने को
ये जितना ख़र्च होता है सवाया उससे बढ़ता
है
लुटाओ दौनों हाथों से मुहब्बत के ख़ज़ाने
को
अरे ओ वक़्त मेरे बख़्त से मत खेल तू
ऐसे
कई सदियाँ क़तारों में खड़ी हैं आज़माने
को
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें