परिचय - नवीन सी चतुर्वेदी
परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी
संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)
तमाम शायर / शायरात के मेरे पसन्दीदा अशआर पर तज़ामीन
वफ़ा-परस्ती का क़िस्सा तमाम लिख देते
तुम इस मकान पै अपना ही नाम लिख देते
मुहब्बत को अयाँ करती निगाहों की ज़ुरूरत है
ये ऐसा दौर है सबको पनाहों की ज़ुरूरत है
हाय रे नादानियाँ उफ़ क्या समझ बैठे हैं हम
उसके झूठे प्यार को सच्चा समझ बैठे हैं हम
मन मुक़द्दस नहीं करोगे क्या
यार अब बस नहीं करोगे क्या
निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल पर तज़मीनी ग़ज़ल
उसका वुज़ूद है भी कि वह बस क़यास है
“यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है
वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है”
तू ख़ुद भी सोच क्यों सोचूँ किसी को
तुझे अच्छा लगेगा क्या अगर मैं
तेरे होते हुए चाहूँ किसी को
तुम्हारा दिल है जिसे भी चाहो उसे बसाओ, हमारा क्या है
कभी जहाँ हम रहे वहाँ अब
तुम्हीं बताओ हमारा क्या है
हमारे पहलू को छोड़कर जब चले
गये तो चले गये तुम
कहा था तुमने गये साल भी दिसम्बर में
वगरना दर्ज़ हैं संडे कई कैलेंडर में
उसको तपना ही पड़ता है जो सबपर शैडो करता है
साफ़ पता चल जाता है कि वो किसको फॉलो करता है
दिखे न भीड़ यहाँ तो करो मलाल नहीं
सनम उसी को मिला जो हुआ निढाल नहीं
अगर अपना समझते हो तो फिर नखरे दिखाओ मत
भले ही फोड़ दो मटुकी भले ही लूट लो माखन
मगर प्राणों से प्यारे तुम हमारा दिल दुखाओ मत
इनायत इसको कहते हैं मुरव्वत इसको कहते हैं
मेरे भाई मेरे दिलदार दौलत इसको कहते हैं
दिलों को जोड़ने वाले अगर हैं भी तो कितने हैं
हमारे हाथ में हीरे अगर हैं भी तो कितने हैं
नयी रुत के मसाले बस वहीं हैं
जहाँ तुम हो उजाले बस वहीं हैं
बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
बग़ैर इश्क़ मुहब्बत अजीब लगता है
अमीरे-शह्र भी सचमुच ग़रीब लगता है
पढ़ाई सी ए की हो या मुहब्बतों वाली
ये ऐसे कोर्स हैं जिनमें नसीब लगता है
यों ही फ़ाक़ों पर भला कबतक गुज़ारा हो हुज़ूर
यों ही फ़ाक़ों पर भला कबतक गुज़ारा हो
हुज़ूर
कोई तो हम बेसहारों का सहारा हो हुज़ूर
हम जो टूटे तो सभी ने क्रॉस कर लीं
उँगलियाँ
ज्यूँ हमारा ग़म कोई टूटा सितारा हो हुज़ूर
ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने को
ज़रा सी बात थी लेकिन ज़माने को सुनाने
को
हमारे नाम से मन्सूब कर डाला फ़साने को
मुहब्बत से हसद की आग बुझ सकती है पर
दुनिया
नई ईज़ाद करती है पुरानी को बुझाने को
परबत बाग़ बगीचे नदियाँ मेरे चारों ओर
परबत बाग़ बगीचे नदियाँ मेरे चारों ओर
बिखरी पड़ी हैं कितनी ख़ुशियाँ मेरे चारों ओर
इन ही के हाथों में हैं जादू वाली छड़ियाँ
खेलती रहती हैं जो परियाँ मेरे चारों ओर
यूँ तो वो बिल्कुल पानी के जैसा था
ब-यादे इरशाद खान सिकन्दर
यूँ
तो वो बिल्कुल पानी के जैसा था
लेकिन
उसपर रंग नहीं चढ़ पाता था
रूह
थिरकने लगती थी सुनकर उसको
बानी में इक ढोल खड़कता रहता था