शाम-सवेरे
पैसा-पैसा-पैसा कर के।
क्या
मिल जायेगा पैसे की पूजा कर के॥
कुछ
बन्दे तो जीते जी ही मर जाते हैं।
अस्पताल
वालों के खरचे चुकता कर के॥
मजबूरी
ने क़त्ल कराया होगा, वरना।
माँ
तो ख़ुश होती है बच्चे पैदा कर के॥
सभ्य-समाज
बनाने का ज़िम्मा था जिन पर।
वे
सारे संस्थान मुकर गए वादा कर के॥
आस
लगाए बैठे हैं हम जैसे मूरख।
ड्रामेबाज़
तो घर में घुस गए ड्रामा कर के॥
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