शुद्ध श्रद्धा व सबूरी की सदारत देखी

शिर्डी वाले साईं बाबा को समर्पित एक ग़ज़ल 

शुद्ध श्रद्धा व सबूरी की सदारत देखी।
मैं जो शिर्डी को गया मैंने ये जन्नत देखी॥

कोई मुज़रिम न सिपाही न वक़ीलों की बहस।
ऐसी तो एक ही साहिब की अदालत देखी॥

जैसे चूमा हो तसल्ली ने हरिक चहरे को।
साईं-दरबार में साकार मुहब्बत देखी॥

बीसियों श़क्लों में हर और से मिट्टी की तरह।
साईं-चरणों से लिपटती हुयी दौलत देखी॥

मैं ने जैसे ही ये सोचा कि फिर आना है यहाँ।
साईं-नज़रों में भी फिर मिलने की हसरत देखी॥

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