सितम की ज़द पर तमाम आसमान है
साहब।
हरेक शख़्स की ख़तरे में जान है
साहब॥
वतन सभी का है लेकिन ज़रा सा अन्तर
है।
किसी का घर है किसी का मकान है
साहब॥
ये दौर वो है जहाँ कोई भी नहीं
महफ़ूज़।
यहाँ सभी की हथेली प जान है साहब॥
हमारे जैसा मधुर तुम न बोल पाओगे।
तुम्हारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान
है साहब॥
किसी के बाप का हिन्दोसतान हो
कि न हो।।
हमारे बाप का हिन्दोसतान है साहब॥व
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